Saturday, March 9, 2013


ham tumse dur bhi nahi,
hum tumhare pas bhi nahi..
jiye to jiye kaise ye kah do hame
ki hum tumhare bhi nahi
aur hum kisi gairo ke bhi nahi
neeta.....k

Friday, January 11, 2013

मानसिक बलात्कार






दिल्ली रेप के बाद औरतो , बेटियों के लिए दु:ख  होता है की कब समाज सुधरेगा और कब सुधरेगी पुरुषो की सोच , हम कितनी बेटियों को यु ही मरते देखेंगे और बस चुपचाप देखते ही रहेंगे।।

द्रोपदी के जमाने से जो चल रहा है वो आज भी चालु है , तब जो दिखाया गया था की घर के देवर और जेठ भाभी की साड़ी खीचते है और तब श्री कृष्णा उनके चिर पुरने आते है , तो मुझे ये समाज नहीं अ रहा की क्या जब देवर और जेठ सारे खिचेंगे तब ही प्रभु आयेंगे।। बहार वालो के लिए नहीं आयेंगे।। ऐसा कोई कायदा होगा क्या प्रभु का ? 
ऐसा हो रहा है की अब हम सारी  औरतो को ये तय कर लेना चाहिए की बच्चे करने ही नहीं।। क्योकि जनम देने वाला भगवान् जब हमारी बेटियों की रक्षा नहीं कर सकता हम क्यों उनकी श्रुष्टि  सँभालने के लिए बच्चे करे , बेटी बचाओ के नारे लगाते है तो बेटियाँ  क्या इसी के लिए है ? 
                जब छोटी थी तब एक कहानी पढ़ी थी की एक आदमी को बहुत सारे  लोग पत्थर मार रहे थे , तो किसीने कहा की जिसने कभी कोई गलती न की हो वो पत्थर मारे, तब कोई नहीं आगे आ सका।। तो आज जब ये रेप के खिलाफ बहुत सारे पुरुष भी खड़े है तब हम ये कह सकते है न की  जो आदमीने कभी सोच में या मानसिकता में भी किसी बेटी ये स्त्री का बलात्कार ना किया हो वो ही इसका विरोध  में आगे आये।। कितने आयेंगे क्या पता?
 रास्ते पे चलते हुवे , बस में या ट्रेन में , मंदिरो की भीड़ में हमें बहुत सरे ऐसे मर्द मिल जाते है जो हमें इस तरह देखते है की हमें लगता है की हमारा नजरो से ही बलात्कार हो गया , खुद की पत्नी के साथ चलने वाला पति भी दुसरो की बीवियों को और बेटियों को देखते रहेता है , हम बलात्कार करना तो बांध नहीं कर पायेंगे पर कमसेकम पुरुष खुद ही ऐसा न कारे तो मानसिक  बलात्कार तो बंध  हो ही सकते है।।
                   बेटियों और औरतो को ये काम घर से ही शुरू करना है , हमारे ही आजुबाजु के आदमियों में से अगर कोई ये काम करता है तब हमें तुरंत उनको टोकना है , शायद आहिस्ता आहिस्ता सब में बदलाव आयेगा।।

नीता कोटेचा "नित्या"

Friday, September 14, 2012



उमीदो के शहर में जाना होता है जब जब  ,
बेबसी ,उदासी और आसू ओ के अलावा कुछ न मिला .
भरे बाज़ार में बिका मेरा प्यार ,
बदले में बदनामी के सिवा कुछ ना मिला।

नीता कोटेचा "नित्या 

Saturday, August 25, 2012

दोस्त एक बार तो मुड़ के देख,
आज भी बह रही है आख़े तेरी  याद में..
नीता कोटेचा

Thursday, July 19, 2012


पूरी जिंदगी कटी अकेले, जिनके इंतजार में दोस्तों
देखो आज वो ही आये है गुलदस्ते ले कर बीदा करने दोस्तों..

नीता कोटेचा


कारण था ही नही कुछ मेरे जीने का दोस्तों,
फिर क्यों इतना दुःख जता रहे हों मेरी मौत पे दोस्तों..

नीता कोटेचा


वो शोहरत , वो इज्जत तब मिली थी जब हम कुछ कर लिया करते थे,
अब आज वापस मिली जब हमने जगह कर दी दुनिया में दोस्तों ..
नीता कोटेचा

Wednesday, March 7, 2012

तुम्हारी दुआओं से भी अब मैं तुम्हें ना मिलूं
जा तू कितना भी धुंदी मैं तुम्हें ना मिलूं

बेकदर शख्स को मोहब्बत सौंपी मैंने
तू तड़प जाये मेरी मोहब्बत को और मैं ना मिलूं

तुम्हारी एक एक साँस पर अपना नाम लिखा था मैंने
तू इन्हें मिटाना चाहे तो भी अब ना मिटून मैं ...

तू पुकारे हाय, आ भी जाओ अब मेरी ज़िन्दगी में दोबारा
बस तभी मेरी सांसें ख़त्म हों ...और मैं ना मिलूं ....!!!

~नीता कोटेचा (Concept)
~कशिश खान (Translated in Urdu)

Tuesday, March 6, 2012

बरसो बाद जब मिले हम उनसे
तो कहने लगे तुम्हारा नाम भूल गये कसम से

हाँ ये वोही शख्स है जो कहते थे कभी
तुम्हे ना भूलेंगे आखरी साँस तक ,भूले चाहे रिश्ते सभी

ये माना के मेरे हाथ में अब उनका हाथ नहीं
पर ये क्योंकर हुआ के मेरी ओर देखने का भी सवाब (रीत ,कांसेप्ट ,रसम ) नहीं

मेरा दर्द , मेरा रंज -ओ -गम वोह क्या जाने अब
मेरे नाम के पन्ने किताब -ए -ज़िन्दगी से फार दिए है जब

ये हिज्र का खेल तो हमारे दरमियान हमेशा से रहा
अपने अपने मक़ाम पर कभी मैं नहीं ,कभी तू ना रहा

मैंने तुम्हें याद रखके किस्मत को मात दे दी ...
तुमने मुझे भूलाकर किस्मत को जीत दे दी ....!!!

~नीता कोटेचा (Write and Concept)
~कशिश खान (Translated in Urdu)

Thursday, February 2, 2012

रब कहता है तू मांगे तो मै दू,
मै कहती हु मर्जी तेरी..
नीता कोटेचा

Wednesday, January 18, 2012

बरसी मनाने आ ही जाओ
वापस दिन आ गया जुदा जोने वाला
नीता

Monday, December 5, 2011

इतनी मोहब्बत क्यों हम तुम से कर बैठे
की
इतनी बेरुखी पे भी हम दूर नहीं हों पा रहे तुमसे..

नीता कोटेचा.

Monday, November 21, 2011

बेवकुफों की तरह इंसानों के पास हम उम्मीद रखते है,
मर्ज़ी ना हों तो उपर वाला भी हमें कहा प्यार देता है...

नीता कोटेचा

Thursday, November 17, 2011

क्या करोगे ऐसी खूबसूरती का जिन्हें चाहने वाले हम ना होंगे,
क्या करोगे ऐसी जिंदगी का जहा साथ देने वाले हम ना होंगे..
मुड़ के लौट आओ वापस हमारे पास,
मुस्कराओगे कैसे गर हसाने वाले हम ना होंगे..
नीता कोटेचा..

Friday, July 29, 2011

नाराज़ होते है तो बुलाता कोई नहीं..
चले जाते है तो आवाज़ देता कोई नहीं..
जिंदगी के मायने कितने बदल गये है अब,
कभी हमारी एक आवाज़ को तरसते थे लोग ,
अब तो चुप रहते है तो पुकारता कोई नहीं..

नीता कोटेचा.

Thursday, July 28, 2011

ख़्वाब पर तो किसी का ना हक है ना काबू,
देखो हमने तुम्हें वही देखा और प्यार कर लिया

नीता कोटेचा
समंदर से कह दो कि अपनी लहरों को संभाल के रखे..

फिर शिकायत ना करे ,
क्योकि हम अपने आप में बहुत तुफ्फां छिपा रखे है

नीता कोटेचा

Monday, May 9, 2011

नेट की दुनिया

ये नेट की दुनिया बड़ी अजीब होती है..
पहले लोग कहते थे की जब किसी से अगले जन्म का लें ना देना हो बाकी तो ही एक दुसरे को मिलते है..
यहाँ हजारों लोग अपने बन चुके है
किस किससे अगले जन्म का नाता हम ढूंढे ये कोई बताए.

जब तुम मिले थे, लगता था की जैसे मेरी दुनिया प्यार से भरपूर हो गई..
बिना देखे तुम्हें, बिना जाने पहचाने मैंने तुमसे प्यार किया..
बेइंतिहा प्यार किया..

पर अब तुम मेरे जीवन में नहीं हो..
बस उब चुके मुझसे
अब कोई नए साथी की तलाश में तुम निकल पड़े ..
या नए साथी के मिलने पर ही मुझसे नाता तोड़ दिया..
ये तो लेना था ही नहीं
बस सिर्फ देना ही था..

मेरी भावनाओं का देना
मेरा दिल का देना
मेरा अश्रु ओ का देना
मेरे वक्त का देना..
और मेरी मुहब्बत का देना..

चलो शायद मैंने भी ऐसा ही कुछ किया होगा गए जन्म में तुम्हारे साथ..
पर एक बात पूछ लू..अब तो हिसाब चुकता हो गया ना..
क्या अगले जन्म में मेरे दोस्त बनोगे तुम ?

नीता कोटेचा

Sunday, May 8, 2011

चलो आज की नींद भी उनके नाम करते है,

ख़्वाब मे तो वैसे भी वो कहा करीब होते है...

नीता कोटेचा

Saturday, May 7, 2011

मुझे माफ़ कर देना मम्मी



मै कुछ जोर से बोल दी थी तुम्हें
और तुम रो पड़ी थी.

पर तुम रसोई में कम करते करते रो रही थी ,
मुझे पता भी चलने नहीं दीया था..

और मै अचानक पानी पिने रसोई में आई,
तो देखा की तेरी आँखों में आँसू बहे जा रहे थे..,

मैंने पूछा मम्मी क्या हुवा ? क्यों रो रही हों ?
तो तुमने कहा बेटा अगर मेरा बच्चा मुझे जोर से कुछ कहे तो मुझसे कैसे सहा जाएगा.

मुझे बहुत दुःख हुवा की मैंने मेरी मा का दिल दुभाया..
मै उसके गले लग गई और मैंने कहा
"मा, तो मुझे डाट लेना था ,क्यों अकेले अकेले रो रही हों ?

तो मा ने कहा "बेटा अगर मै तुम्हें जोर से डाटूंगी तो तुम्हें भी दुःख होता ना.
वो बात को याद करके आज भी रो देती हु..

मुझे माफ़ कर देना मम्मी.

मै कितनी खुशनसीब हु की तुम आज भी मेरे पास हों और मेरे साथ हों..

Monday, May 2, 2011

तुम्हारे लिए
















तुम्हारे लिए
कितने अश्क बहाए तेरे लिए.
तुम तो मुझे भी भूल गये हों उम्र भर के लिए...
काश तुम्हारा दिल पहले जैसा होता..
तो आज हम भी मुस्कराते जिंदगी के लिए..
कभी सोचती हु क्या तुम हों इतने प्यार के हक़दार
पर फिर सोचती हुं मै तो हुं ना सिर्फ प्यार देने के लिए..
जाओ अब तुमसे कभी फ़रियाद ना करेंगे
और ना कभी तुम्हारे दर पे प्यार मांगने आयेंगे..
तुम जितना चाहे बदल जाओ ,
आ जाना जब जरुरत पड़े हमारी कभी जिंदगी में..






नीता कोटेचा

Friday, April 29, 2011

दोस्ती



दोस्ती जिंदगी है, शान है, जान है,
अगर दोस्त साथ रहे तो..

नहीं तो

दोस्ती एक भवर है जिंदगी की..
जो जब टूटती है तो,
दिल को लहु लूहान कर देती है,
ना अश्क थमते है और ना ही जिंदगी रहेती है जीने लायक दोस्तों ..

नीता कोटेचा "नित्या"

Monday, April 25, 2011


आज तुम्हारे सारे ख़त पढ़े..
किसी मे लिखा था की तुम्हारे बीना मै जी नहीं पाऊँगी,
किसी मे लिखा था " तू कुछ सोच मत उलटा, मै कभी भी नहीं बदलूंगी.."
किसी मे लिखा था " मै तुम्हारी ही रहूँगी जिंदगी भर "
किसी मे लिखा था " अगर तुम मुझसे कभी दूर हुई तो जान से मार डालूंगी तुम्हें "
आज तुम मेरे बीना जी रही हों,
आज तुम बदल गई हों.,
आज तुम कही भी मुझे दिखाई भी नहीं दे रही हों,
और आज तुम ही मुझसे दूर हों गई हों,
अब तुम ही कहो क्या करूँ ये ख़त का ?
अगर मिटा देती हु तो तुम्हारा प्यार मुझे अब तो सिर्फ इसमें से ही मिलने वाला है..कैसे मिटाउ ?
और अगर नहीं मिटाती हु तो मेरी आंखे रोना बंध नहीं करती..
क्यों ऐसा रिश्ता बंधा जिसमे जब तक साथ थे तुम खुश थी,
पर आज साथ नहीं है तो भी तुम खुश हों...
चलो मै ही तय कर रही हु की प्यार का खोना बर्दाश्त नहीं होगा मुझसे..
भले रो रो के आखे चली जाये ..
तुम्हारी सखी..

नीता कोटेचा "नित्या"

तुम्हें आवाज़ दे के देख लिया..
तुम्हें दिल से
पुकार के देख लिया..


लगता है या मेरी आवाज़ नहीं निकल रही
या फिर तुम्हें मेरी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही..

मैंने तो हर दम तुम्हारा साथ चाहा था..


मैंने तो हर दम तुम्हें पाना चाहा था..
लगता है या मेरा पास रहना तुम्हें अच्छा ना लगा ,
या फिर मेरे करीब आना तुम्हें अच्छा नहीं नहीं ..

इस कदर तो मुह ना मोड़ो,
कि टूट जाए हम,
ना तुम मुझे कभी ढूंढ़ पाओ ,
और ना कभी खुद को पा सके हम

नीता कोटेचा "नित्या

बस एक आख़िरी सास लेनी है अब...
जी को अब आराम देना है अब...
क्यों परेशान करे उसे तेरी यादों से,
सब बातों से उसे आराम देना है अब...

जी किया आख़िरी सास पे तुजे बुला लू,
एक बार पछताने का मौक़ा दे दू..
क्योंकि फिर जो तुम रोओगे वो शायद माँ ना देख सकूँ,
पर नहीं बुलाना तुम्हें जाने दो,
क्योंकि ये ही कहोगे की गलती तुम्हारी थी..
की तुमने मुझसे ज्यादा मुहब्बत की..

इसलिए अब नहीं अब बस...
अब मौक़ा तुम्हें देना नहीं एक भी..
बस तुम रोना नहीं मेरी मौत पे दोस्त,
क्योंकि गलती मेरी थी ना, मुहब्बत तो मैंने की थी ना..
तो मै ना देख पाऊँगी तुम्हें रोते हूवे..

नीता कोटेचा

Friday, April 22, 2011

मनन...........(परवरिश )

आज स्वपनिल और संध्या ने तय किया था कि आज तो वो डॉ. से कहेंगे ही की अब दवाई बदलो क्योंकि....
आज मनन को बुखार में तपते चौथा दिन था ...पर बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था..आखिर स्वप्निल और संध्या से अब सहा नहीं जा रहा था तो उन्होंने डॉ. से कहा कि क्या हम मनन को किसी अच्छे अस्पताल में दाखिल करवा दे ? डॉ. ने मना कर दिया कि ऐसी कोई जरुरत नहीं है बुखार उतर जाएगा....पर अब वो दोनों माने नहीं और शहर के सबसे अच्छे अस्पताल में मनन को दाखिल करवा दिया गया..
उम्र बहुत काम थी मनन की..सिर्फ सात साल का ही तो था....पर उसे ठीक से होश नहीं आ रहा था. वो नींद में कुछ बोले जा रहा था..क्या बोल रहा था ये किसी को समझ नहीं आ रहा था..|
आखिर में डॉ. ने मनन के माता पिता को अपनी केबिन में बुलाया...और पूछा कि "अब आप लोग मुझे बताये कि जब उसे बुखार आया है उसे पहले आपके घर में कुछ हुआ था ? " स्वप्निल ने जवाब दिया " ऐसा कुछ ख़ास नहीं हुआ था. बस हम दोनों के बीच में छोटा सा झगडा हुआ था....पर ये हम दोनों के बीच बहुत आम सी बात है ....इस बार भी कोई नयी बात नहीं हुई .."
डॉ.बीच में ही गुस्से से बोले " चलता रहता है से मतलब ? तुम लोगो की अपने बच्चे को लेकर कोई जवाबदारी है की नहीं....तुम लोग समझते क्यों नहीं..पहले ये बतायो की झगडा क्या था ?
स्वप्निल थोड़ा डर सा गया..उसने कहा " उस दिन मेरी बीवी के मायके वालो ने पूजा कीर्तन रखा था और हमारे बीच इसी बात को लेकर झगडा हुआ कि उन लोगो ने मुझे इज्ज़त से आमंत्रित करने के लिये फोन नहीं किया.."
और संध्याने कहा था कि " तुम चाहो तो मनन से पूछ लो उसे भी पता है कि मम्मी और पापा दोनों का फोन आया था.....उन लोगो ने बहुत इज्ज़त और सम्मान से हमहे बुलाया है "
पर मैंने ही मनन को बहुत जोर से डांट के पूछा था कि " सच बताओ, कहीं मम्मी ने ही तो नहीं तुम्हे झूठ बोलने को कहा है ...."और वो मेरी इस बात और जोर की आवाज़ से डर गया था और अपनी मम्मी के पीछे छुप गया था..और मै मेरी जिद्द के कारण पूजा में नहीं गया जिसकी वजहे से संध्या रो रो के सो गई..सुबह उठ ने के बाद हमने देखा तो मनन को बहुत तेज़ बुखार था..|
इतना सुनते ही डॉ. ने जोर से अपना हाथ अपने टेबल पे पटका और बोले " तुम लोगो में अक्ल नाम की जैसी चीज है की नहीं..खुद की बात को सही और झूठी साबित करने के लिये एक छोटे बच्चे का सहारा लिया..शर्म आनी चाहिए तुम दोनों को..."
स्वप्निल और संध्या को खुद की गलती समझते देर नहीं लगी .. पर अब क्या ?
आज ८ दिन हो गए पर मनन का बुखार नहीं उतर रहा था. और ना वो ठीक से होश में आ रहा था..
आखिर में डॉ. ने कहा " अब आपके पास एक ही रास्ता है, आप अपनी पत्नी के मायके वालो को बुलाओ औरअच्छे से बाते करो ताकि उन बातो को मनन सुने ....इसी से कुछ फर्क पड़ेगा मनन के मन पर ..जिस से वो कुछ ठीक हो सकता है ......खुद के गुस्से का डर निकालो उसके मन से ...."
बिना वक़्त बर्बाद किये ...स्वप्निल अपने ससुराल गया और अपने ससुर से माफ़ी मांगी और डॉ. ने जो जो बाते उस से कही थी सब जा कर बताई..सास और ससुर तुरंत उसके साथ अस्पताल पहुंचे .और जैसे कि डॉ. ने उन्हें समझाया था वैसे ही उन्होंने किया..और कुछ ही वक़्त में इसका असर मनन की आँखों में देखने को मिला ....वो अपने मम्मी पापा के प्यार को करीब से देख कर कुछ खुश नज़र आ रहा था ......आहिस्ता आहिस्ता मनन का बुखार उतरने लगा..और अगले तीन में वो काफी ठीक भी हो गया ..पर ठीक होने के बाद मनन ने अपनी मम्मी से सबसे पहले ये पूछा " मम्मी , पापा गुस्से में तो नहीं है ना ?"और संध्या ने हँसते हुए उसके बालो को सहला दिया ....
अब डॉ. ने उसे आज घर ले जाने की अनुमति दे दी..स्वप्निल और संध्या को डॉ. ने बुलाया और कहा " तुम्हारे लिये जो बहुत छोटी सी बात होती है वो कभी कभी बच्चों के लिये बहुत बड़ी बात ...इस जीवन का आधार बन जाती है ..उनके मन में वो ऐसी कुंठा को जन्म देती है कि उनके जीने का आधार ही बदल जाता है ..वो माता पिता के झगड़ो को सह नहीं सकते..... अब मै ये ही कहूँगा कि आगे से उसके सामने बहुत संभाल कर बात करना"|
उस दिन से स्वप्निल और संध्या ने अपने जीने का तरीका ही बदल लिया और घर में हर पल ख़ुशी से भरा वातावरण रखने लगे.. उन्होंने समझ लिया था कि बच्चों को बहुत ही प्रेम से और ध्यान से बड़ा करना ही उनका कर्तव्य है |
स्वप्निल सोच रहा था कि हम अपने अभिमान , मान , अपमान के चक्कर में अपने ही बच्चों को अपनी ही बातो से परेशान करते रहते है और छोटी छोटी बातो पर हम सबका कभी ध्यान भी नहीं जाता.. बच्चों के मन को पढ़ना बहुत जरुरी है ...नहीं तो भगवान ने दिए हुए फूल को मुरझा जाने में देर नहीं लगेगी ..और हमने भगवान का अपमान किया ऐसा ही कहलाएगा .........

Wednesday, April 20, 2011

विश्वास की डोर

जैसे जैसे अंधेरी(मुंबई ) स्टेशन नज़दीक आता गया मौनी के मन में घबराहट वैसे वैसे बढती जा रही थी , मौनी अंधेरी के एक कॉलेज में प्रोफेसर थी .कॉलेज में सब उससे डरते थे|पर पिछले ४ महीनो से मौनी अपने ही कॉलेज के प्रोफ़ेसर गाँधी से..आमना सामना होने पर डरने लगी थी..उसे ये ही डर था कि अगर किसी ने ..या खुद प्रोफ़ेसर गाँधी ने उसे चोर नज़रो से देखते हुए ... देख लिया तो..??????
मौनी को वो दिन याद आता था जब उसकी मम्मी उसे कहती थी "मौनी शादी कर ले., मेरे लिये तू शादी नहीं करके गलती कर रही हो ,मेरे जाने के बाद तुम पूरी जिंदगी अकेली कैसे जीएगी .और उम्र बढ़ जाने के बाद कोई मिलेगा भी नहीं...जो तुम्हारा जीवन साथी बन सके..और हर बार मौनी ने मम्मी की बात को सुन कर अनसुना कर दिया .... अब मौनी को बहुत बार मम्मी की बात याद आती थी. ... बहुत बार ऐसा होता था कि उसे लगता था की इस वक़्त कोई ना हो जिसके साथ वो अपने दिल की...अपनी दिनचर्या की सभी बाते उसके साथ कर सके ,...अपने दिल का गम हल्का कर सके..|पर अब बहुत देर हो चुकी थी ....वक़्त उसके हाथो से किसी मछली सा फिसल चुका था ...अब ये बात सोचकर खुद को दुःख देने का कोई मतलब नहीं .... पर दिल और दिमाग की लड़ाई उसके अपने वश में नहीं थी...
हमारे ना चाहने पर भी ....दिमाग में उठने वाली सोच खुदबखुद किसी बिन बुलाये मेहमान की तरह उसके करीब चली आती थी ...|
कभी कभी दिल करता था की बच्चों से थोडा हँसी .. मज़ाक करे ..उनसे बाते करे ...पर कभी ऐसा वो कर नहीं पाई .....पूरी जिन्दगी खुद को उदासी के खोल में बंध रखा औरअपनी गुस्से वाले प्रतिरूप अब यूँ अचानक .कैसे वो सबके सामने थोड दे |प्रोफ़ेसर गाँधी का यूँ अचानक उसकी जिंदगी में ...उस से पूछे बिना आना,...उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि अब ये ४४ की उम्र में किस्मत उसे क्या दिखाने वाली थी? प्रोफ़ेसर गाँधी अपनी उम्र के ४७ साल पूरे कर चुके थे ..,,उन्होंने भी शादी नहीं की थी |जैसा वो पहले दिन से सुनती आई थी कि प्रोफ़ेसर बहुत गुस्से वाले है ...पर उनसे मिलने के बाद पता चला कि ...वो बहुत ही हँसमुख इन्सान थे..बिंदास हँसते और हँसाते थे और मौनी ने तो अपनी जिन्दगी में कभी किसी को हँसते हुए देखा ही नहीं था....जिसकी वजह से अब मौनी हँसना ही भूल गई थी..|
कभी कभी जिन्दगी के आस पास हम ही ऐसा वातावरण खड़ा कर देताहै कि ना चाहते हुए भी उसी के मकडजाल में फसं कर रह जाते हैं |
अंधेरी स्टेशन आ गया ....वो दरवाजे के पास ही खड़ी थी और उसने देखा प्रोफ़ेसर गाँधी तो पहले से ही उसका इंतजार कर रहे थे....बहुत दिनों से उन दोनों का ये नित्य क्रम हो गया था....वो ध्यान भी तो बहुत रखते थे मौनी का..
वो जब जब मिलते थे तब तो जैसे मौनी हँसने के अलावा कुछ काम ही नहीं करती थी..और अलग होने के बाद भी तो वो दोनों दिन में दो बार फोन पर बात कर ही लेते थे..
मौनी कभी कभी अपने इस रिश्ते को लेके डर सी जाती थी..पर जब भी प्रोफ़ेसर को देखती वो डर भूल जाती....ना चाहते हुए भी वो दिनोदिन उनके करीब होती जा रही थी ...रोज कॉलेज के लिये जल्दी निकलना .. दोनों का साथ में मिल के चाय नाश्ता करना और फिर कॉलेज में एक साथ जाना .....
आज भी जब से मिले तब से मौनी का हँसना ही शुरू था..दोनों नाश्ता कर रहे थे तभी प्रोफेसर ने मौनी से पूछा ''मौनी, तुमने मुझे ये तो बताया कि तुमने शादी नहीं की ..अपनी मम्मी के लिये,पर तुमने मुझ से कभी नहीं पूछा कि मैंने शादी क्यों नहीं की..?"
मौनी की धड़कन जैसे रुक सी गई, उसे पता नहीं था कि प्रोफ़ेसर अपनी बात किस रूप में उसके सामने रखेगे ...वो ये तो जानती थी कि ये बात कभी ना कभी तो उठेगी ही|
मौनी ने खुद को संभालते हुए कहा कि " आप ही बता दो कि ''क्यों नहीं की शादी ?"
तब प्रोफ़ेसर ने कहा " मुझे एक लडकी पसंद थी जो मेरे साथ पढ़ती थी., उसकी शादी किसी और से हो गई..तब से मै किसी और मै फिर कभी किसी को अपने ह्रदय में स्थान नहीं दे पाया|
मौनी ने प्रश्नवाचक नज़रों से उनकी तरफ देखा जैसे पूछ रही हो "क्या अब वो प्यार तुमने मुझे में भी नहीं देखा ?
तभी प्रोफ़ेसर बोले " नजरो से मत पूछो मौनी जो पूछना है जोर से पूछो ना..".....कुछ देर की खामोशी और स्त्बधता के बाद मौनी की नजर शर्म से झुक गई ..|
तभी प्रोफ़ेसर ने अपने हाथ से उसका चेहरा ऊपर किया..मौनी जैसे कांप सी गई..पहली बार उसको किसी पुरुँष ने छुआ था.. उसने डर और हया से अपनी आँखे बंद कर ली|तभी प्रोफ़ेसर ने कहा " मौनी शायद भगवान को ये ही मंज़ूर था कि हम दोनों मिले इसीलिए हमारी शादी उस वक्त नहीं हुई ..अब हमें सच्चे साथ और साथी के प्यार की जरुरत है जो हमें एक दूसरे से ही मिल सकती है..अब हम जिंदगी को अच्छे से समझने लगे है ..इस से पहले कि वक्त हमें फिर से अकेला कर दे उससे पहले आयो ..... हम एक हो जाए..
और उस वक़्त प्यार और विश्वास की डोर में बंधी मौनी ने प्रोफ़ेसर का हाथ कस के पकड़ लेती है .

Thursday, March 31, 2011

" स्वप्निल"

भगवान ने ये कैसी दुनिया बनाई है कि मानव उसकी मोह माया में से निकल ही नहीं सकता.. जिनके बच्चे होते है वो भी रोते है जिनके नहीं होते वो भी रोते हैं ....

"शादी के ८ साल होने को आये थे पर अमिता को बच्चा नहीं हों रहा था..अमिता और नीरव ने प्रेम विवाह किया था .अमिता मराठी और नीरव गुजराती था .नीरव के मम्मी पापा इस शादी से खुश नहीं थे.इसलिए नीरव ने शादी करके अपना अलग घर बसा लिया था................. अब तो सब के रिश्ते अच्छे हों गये थे फिर भी अभी तक नीरव साथ में रहने के लिए तैयार ना था.उसके दिल में एक दुःख था कि उसकी पसंद पर उसके मम्मी पापा ने शक किया था..और मम्मी पापा को लगता था कि नीरव उन्हें समझ नहीं पा रहा था..ये इसी नासमझी में ही वो अलग रहे ..शादी के ५ साल बाद एक बार जब नीरव के पापा को हृदयघात हुआ और अमिता ने उनकी जिस अपनेपन से सेवा की तब उन्हें अहसास हुआ कि अमिता भले अलग धर्म की थी पर ह्रदय तो उसका भी नाजुक ही था..फिर रिश्ते अच्छे हों गये पर नीरव साथ रहने के लिए कभी माना नहीं..आज जब डॉ. के से खबर मिली की अमिता माँ बनने वाली है तब वो बहुत खुश हुआ ,पर डॉ. ने ये भी कहा था कि अमिता की बड़ी उम्र और भारी शरीर के कारण उसे बहुत संभालना पडेगा..नहीं तो माँ और बच्चे दोनों के लिए ख़तरा है..
" उपरवाले का उपकार समझ कर उन्होंने बड़े ध्यान से दिन बिताने शुरू किये..इस बार नीरव की मम्मी खुद से आकर उनके साथ रहने लगी..और अमिता की देखभाल करने लगी..नीरव ये देखकर बहुत ख़ुश हुआ ..कभी कभी अमिता को हंसाने के लिए नीरव कहता "बेटी होगी या बेटा ? और हम
उनका नाम क्या रखेंगे..कुछ तो सोचो.." पर अमिता कांप उठती और कहती " नीरव अभी कुछ मत सोचो..जब जो होगा तब वो सोचेंगे.."और तीनो जन चुप से हों जाते..क्योकि डर सब के दिल में उतना ही था..
' सातवा महीना चल रहा था एक दिन अमिता की तबियत बहुत बिगड़ने लगी और उसे अस्पताल ले जाना पडा. उसे और उसके बेटे दोनों को बचा लिया गया..पर डॉ. ने नीरव को बुला कर कहा कि" भगवान् से प्रार्थना करो की बच्चा बच जाए..और दो महिने अच्छे से निकाल जाएँ ताकि बचा सुरक्षित जन्म ले सके .. " नीरव को चिंता ने घेर लिया..पर उसने अमिता को कुछ नहीं कहा.. नीरव का चहेरा देख के अमिता समझ गई कि बच्चे को कुछ ज्यादा ही तकलीफ है . एक दिन अमिता की तबियत कुछ ज्यादा बिगड़ी .पर उसने भी नीरव को परेशान करना ठीक ना समझा ..इसलिए वो भी चुप रही..ऐसे ही देखते -संभालते आठवा महीना लग गया. और अब बस बीस दिन निकालने बाकी थे..उतने निकल जाए तो भी अच्छा था..
"पर जो इंसान सोचता है वो तो होता नहीं.. उसे पाचवे दिन ही तकलीफ शुरू हों गई और तुरंत हॉस्पिटल ले जाना पडा..थोड़ी देर में डॉ. ने आकर कहा की बेटा हुआ है..पर बच्चे को कांच की पेटी(इन्कुबेटर ) में रखना पडेगा..क्योकि बच्चे की धड़कन बहुत धीमी चल रही थी. नीरव ने तुरंत बच्चे को दुसरे अस्पताल में भर्ती करवा दिया. उसी अस्पताल में एक कमरा अमिता के लिए ले लिया..ताकि वो भी बच्चे के करीब रह सके. एक दिन बीता , बड़े डॉ. को बुलाया गया.. दुसरा दिन बीता . और दुसरे बड़े डॉ. को बुलाया गया..बच्चे को देखने के बाद डॉ.कि आपस में बातचीत हुई और उन्होंने नीरव को बुलाया और कहा" बच्चा वेंटीलेटर पर ही है..हमारी तरफ से हमने कोई कसर बाकी नहीं रखी पर हमें कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही .. अब आप लोगो को तय करना है की वेंटीलेटर हटा दे या नहीं.."
' नीरव पर तो जैसे आसमान गिर गया.. वो अमिता को ये सब कैसे बताये , ये सोच कर परेशान था.. इतने सालो के बाद भगवान् ने बच्चा दिया और उसे मारने का निर्णय भी हमें ही करना है ,, आखिर उसने अमिता से ये बात कही ..अमिता संभाली नहीं जा रही थी..थोड़ी देर बाद नीरव ने तय किया की इस तरह से अपने बच्चे को परेशान नहीं कर सकता..वो डॉ.. को कहने के लिए खडा हुआ कि .. तभी अमिता ने उसका हाथ पकड़ कर कहा " नीरव, चलो हम अपने बच्चे का नाम तो रख ले..जिससे हम उसे कुछ नाम से याद कर सके.." अमीता की ये बात सुन कर अब नीरव टूट सा गया..और जोर से रो पडा..
' अब अमीता ने नीरव से कहा." नीरव रोने से कुछ नहीं होगा..हम हमेशा भगवान् से कहते थे की हमें बच्चा दो ,इसलिए उसने दे तो दिया..पर उसकी मृत्यु की जिमेद्दारी भी हमें ही दे दी..अब हम उससे कभी बच्चा नहीं मांगेगे..... हम उसका नाम" स्वप्निल" रखते है...... वो अपना सपना पूरा करने ही तो आया था.. भले चार दिन के लिए सही..... पर उसने हमें मम्मी पापा बनाया तो सही.."अब नीरव डॉ. के कमरे की तरफ जाने लगा तभी उसे पीछे से अमिता की और उसकी मम्मी की रोने की आवाज सुनाई दी...

नीता कोटेचा "नित्या"

Monday, March 28, 2011

भूल

अहमदाबाद एक्सप्रेस बहुत तेजी से अपनी मंज़िल की और बढ़ रही थी पर वनिता के मन में चैन नहीं था..ना आँखो में नींद थी...बस बीस साल पहले की बाते जैसे आँखो के आगे से एक पिक्चर की तरह आ जा रही थी...उसने अपनी सोच से बचने के लिये आँखे जोर से बांध कर ली ....आँखे बंध करने से सोच अटकती कहाँ है ?और बंध आँखों से भी सोच ने वनिता को जैसे घेर लिया और अपने अतीत के शिकंजे से वनिता खुद को ना बचा सकी..वो सोच रही थी कि कभी रिश्तो में हम ऐसे उलझ से जाते है कि हमें खुद को पता ही नहीं चलता की हम सही है या गलत..........|.
और उसे याद आ गई सारी बाते....वनिता के मम्मी पापा का देहांत हुआ तब वो सिर्फ १२ साल की थी.....अब घर में चाचा और वो दोनों
ही बचे थे .. ..चाचा भी कहाँ ज्यादा बड़े थे.....बस उससे सिर्फ ८ साल बड़े..पर चाचा ने सब बहुत अच्छे से संभाल लिया था.और उसे याद आ गई सारी बाते....अब घर में वनिता की कोई भी बात हो तो .. आख़िरी निर्णय उसके चाचा का ही होता था..और चाचा की बात वो मान भी लेती थी..वो चाचा भतीजी से ज्यादा तो दोस्त थे एक दूसरे के..बस चाचा ही उसकी जिन्दगी थी|
ऐसे ही जब वो एक दिन सुबह सो कर उठी थी तो उसने देखा था कि उनके कई रिश्तेदार घर आये हुए थे..और जाते वक्त कहते गए कि आज शाम को चाचा को देखने कोई लड़की वाले आने वाले है .... वनिता इस बात को तो भूल ही गई थी की चाचा की जिन्दगी में उसके अतिरिक्त दूसरी लड़की भी कोई आ सकती है उसे ऐसा लगता था कि जैसे वो और चाचा ही पूरी जिन्दगी साथ साथ रहने वाले है ......|
और कुछ दिन के बाद चाची आ ही गई.....चाची का आना वनिता को पसंद नहीं आया |अब चाचा को उसके लिये कहाँ वक्त था....वनिता को दुःख इस बात का था की चाचा को पता भी नहीं था कि उसके दिल पे क्या बीत रही थी..
थोड़े दिन बाद चाची को वापस उसके मायके वाले अपने घर ले गए और कह के गए की हम ८ दिन बाद छोड़ के जायेंगे..अब वनिता खुश थी की अब वो चाचा के साथ अकेली रह सकेगी....|
जिस दिन चाची गई उस दिन वनिता ने बहुत अच्छा खाना बनाया..खाना खाने के बाद दोनों थोड़ी देर साथ में बैठे बात करने के लिये..चाचा उसे सब पूछ रहे थे कि कैसी चल रही है पढ़ाई...घर आने और जाने का वक़्त उसकी सहेलियों के बारे में और भी बहुत कुछ..
तभी चाचा को बीच में रोकते हुए वनिता ने कहा " कितने दिनों बाद आप ये सब मुझ से पूछ रहे हो..कहाँ खो गए हो आप?"चाचा ने हँस के जवाब दिया"वनिता अब मेरी भी जिम्मेदारी है,...मुझे तुम्हारी चाची की तरफ भी तो ध्यान देना है ना.अब तुम्हारे लिये तुम्हारी चाची है ना..उसके कहो अपने मन की बाते ..अपना सारा दिनचर्या अपनी चाची से कहो ...वो भी खुश हो जाएगी .. ..तभी वनिता बिच में ही बोल उठी" जरुरत क्या थी शादी करने की ? क्या मै नहीं थी आप के लिये ?" चाचा जोर से हँस पड़े..और बोले"विनीता मेरी भी कुछ जरूरत होती है जो तुम पूरा नहीं कर सकती हो.."
और वनीता ने कहा" एक बार कहा तो होता सब ख़्वाहिश पूरी करती आपकी मै..मै भी अब छोटी नहीं हूँ "|और वनिता की बात सुन कर चाचा झटके से खड़े हो गए और कुछ भी बोले बिना गुस्से में अपने कमरे में चले गए
वनिता भी उनके गुस्से से डर गई..तब तो अपने कमरे में चली गई पर पूरी रात सो ना सकी..सुबह होते होते उसे नींद आई..जब उठी तो उसने देखा ८ दिन बाद आने वाले चाची घर वापस आ गई थी ....वनिता समझ गई कि चाचा ने ही उनको बुला लिया होगा..दो दिन बीत गए उसने देखा चाचा उसके साथ बात नहीं कर रहे थे..|और तीसरे दिन
वनिता घर छोड़कर निकल गई..
पूरे रास्ते
वनिता वो ही तो सोच रही थी कि क्या क्या नहीं हुआ इतने सालो में उसके साथ.. कितने लोग आये उसकी जिंदगी में ..जब चाचा के घर से निकली थी तब क्या था उसके साथ ... बस एक सहेली का साथ ..उसीने तो उसे मुंबई भेजा था..वहां जाने के बाद पहले दो दिन वो सहेली के साथ उसके मामा के घर रही और दो दिन के बाद उसने वहां की एक हॉस्टल में उसे जगह दिला दी..और फिर एक ऑफिस में काम.. आहिस्ता आहिस्ता ऑफिस वालो के साथ दोस्ती हों गई.....काम ज्यादा करने लगी.....पैसे कमाने लगी और किराये पे अपना छोटा सा घर लिया..बीच बीच में अपनी सहेली से चाचा का हाल जानती रहती थी..उसके चाचा वनिता के जाने के बाद पागल से हो गए थे... ..कहीं से वनिता का पता मिल जाये इसके लिए वो कितनी बार उसकी सहेली से उसके बारे में पूछ चुके थे.....कि वनिता का कोई समाचार मिले तो जरुर बताना.....समय जैसे अपनों को भी दूर कर देता है वैसे ही थक हार कर ... आहिस्ता आहिस्ता चाचा ने भी उसकी सहेली से भी बात करनी बंध कर दी थी |.पर इस बार उसी सहेली ने आ कर उसे ये खबर दी कि अब उसके चाचा बहुत बीमार है जब से वो घर छोड़ के गई है .....
ये सुन कर खुद पे काबू नहीं रख पाई वनिता और सहेली कि गोद में सर रख कर फूट फूट रो पड़ी ......जैसे बरसो का रुका सैलाब अपने किनारे तोड़ कर बाहर आ गया हो|अब उसके सामने सबसे बड़ा प्रशन ये ही था कि वो घर कैसे जैसे ..चाचा चाची का सामना कैसे करे ..उनसे नज़रे कैसे मिलाये? बहुत बार अकेले में सोचती थी की गलती किसकी थी उसकी ...उसकी उस उम्र की या उसकी सोच की..चाचा ने तो कभी कोई गलत व्यवहार नहीं किया था.. तो उसे ये आकर्षण कैसे हों गया था?..उसके दिमाग में तब एक ही बात थी की चाचा सिर्फ मेरा ही है..वो और किसका हों ही नहीं सकता और उसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार थी....चाचा ने भी तो कभी कुछ समझाने की कोशिश नहीं की...पर अगर चाचा समझाते तो क्या वो उस वक़्त उनकी बातो को समझ पाती ....शायद नहीं. और उसने चाचा को मौक़ा भी तो नहीं दिया की वो उसे कुछ भी समझा सके..बस रुठके घर छोड़ दिया था..और मुंबई आ गई बिना किसी को बताये | ऑफिस में कितने परिणित और बिन परिणित पुरुषो ने उसको प्यार करने की कोशिष की पर ना चाहते हुए भी सब में उसे चाचा ही दिखाई देते थे .पर एक इंसान ने आ कर ...उसकी सोच ...उसका अपने चाचा को देखने का नजरिया ही बदल के रख दिया ..तब उसे पता चला कि प्यार क्या है..और अपनों की देखभाल और उनको संभाल के रखने की जिम्मेवारी उसे उम्र की इस पड़ाव पर पता चली कि वो चाचा को अपने साथ गलत सोचती रही अब तक |पर कल अचानक ही उसकी सहेली ओफिस आ पहुंची और वनिता का हाथ खींचते हुए उस से बोली कि ''वनिता चलो तुम्हारा चाचा बस आखरी सांसें गिन रहे है और शायद तुम्हारा इंतजार है उन्हें......और वनिता सब कुछ छोडके अहमदाबाद की ओर दौड़ पड़ी थी.उसे कल ही पता चला था कि चाचा बहुत ज्यादा बीमार है..और उसे याद कर रहे है..घर पहुँच कर उसने देखा तो चाचा बिस्तर पे लेटे हुए थे..जैसे दिखाई भी नहीं दे रहे थे..और चाची बहुत रो रही थी ..वनिता को देख कर वो उसके करीब आई और बोली " वनिता तुम्हारे जाने के दिन से वो ऐसे ही बिस्तर पे है..और एक ही बात पूछ रहे है.की वनिता को संभालने में मेरी कहाँ गलती हुई?वनिताकी आँखो में ये सुन कर आंसू आ गए..और चाचा के पास जा कर बोली.." चाचा गलती आपकी नहीं थी गलती मेरी सोच में थी मुझे माफ़ कर दो.." और चाचा ने उसके सर पे हाथ रखा और आखिरी साँस ले ली..जैसे एक बोझ से मुक्ति मिल गई......|
नीता कोटेचा "नित्या"

दिवाली क्या है


दिवाली क्या है ये उनसे क्यों पूछते हों जिनके घर भरे है..
उनसे पूछो जो मुश्किल से ये दिन ख़तम करते है..
उनसे पूछो जिनके घर नए कपड़ो की बौछारे नहीं होती ,
जिनके घर फटाके नहीं आते..
जिनके घरो में घी के दिए नहीं जलते..
क्योकि खाने को ही घी नहीं होता..
जिनके पापा घर पर देरी से आते है..
की बच्चो का सामना ना करना पड़े..
और बच्चे जल्दी सो जाते है जूठमुठ का ..
की मम्मी पापा को बुरा ना लगे..
जिनके घर में मिठाई नहीं आती..
जिनके घर पे ५० रुपिया का तोरण नहीं बंधता.
जिनके घर कोई आता भी नहीं ..
पर फिर भी सब एक दुसरे के साथ मुस्कराते है जैसे कुछ हुवा ही ना हों..
नीता कोटेचा
खाली सा लगता है

क्यों सब कुछ खाली सा लगता है..
आंखे भरी है आँसू ओ से फिर भी आँखो में शुन्यता
है ,

दिल है दर्द और ख़ुशी यो से भरा..
फिर भी दिल वीरान लगता है..

बाहों में जुल रही है कितनों की बाते..
जिसे गले लगाकर हम फिरते है पूरा दिन..
फिर भी एक अकेलापन सा लगता है..

जब भी तलाशती हुं खुद को..कभी अकेले में..
तो वो अकेलापन जैसे घुटन सा लगता है..

छोड़ दिया है अब खुद की परेशानियों को सोचना..
दिन रात जैसे जिंदगी का सिर्फ आना जाना लगता है..

नीता कोटेचा..
यु तो जिंदगी ने दर्द मुझे दीया नहीं कभी,
ये तो बातो बातो में जिंदगी बया हों गई..
तुमने मुस्कराना सिखाया था, चलो अच्छा है रुलाना भी सिखा रिया
शिकायत उसकी भी ना करेंगे की सनम तुमने रुला दिया..
हम तो उनके करीब रह कर भी उन्हें छु ना सके,
पता ही ना था की वो मेरे है या नहीं..
रोज एक खवाब तेरा देख ही लेती हु मै,
चलो ऐसे ही खवाहिशे पूरी कर लेती हु मै..
इस तरह से किसीकी जरुरत महेसुस हुई मुझे ,
जैसे की आखरी सास की तमन्ना अधूरी हों...

Sunday, October 31, 2010

एक नई आशा..

"हॉस्पिटल का वातावरण ही कुछ ऐसा होता है जहां जाते ही दिल घबराने सा लगता है..जैसे मंदिर में जाने से खुद ही दिल को शांति सी लगती है वैसे ही हॉस्पिटल में जाने से खुद ही घबराहट शुरू हो जाती है..चारों ओर एम्बुलेंस रहती है कितने लोग रोते रहते है..कोई अकेले अकेले बाते करते रहते है..
आज मीनू का हॉस्पिटल जाना हुआ .. उसकी बेटी की सास की तबियत ठीक न होने से उन्हें भर्ती किया था..बेटी की शादी की हुए अभी ३ महीने हुए थे..जब बेटी और दामाद घूम के वापस आये..१० दिन सब घर का काम बता कर सास और ससुर गावं में खुद के दूसरे घर चले गए..इस बहाने कि बेटे और बहु को थोड़ा अकेले घर में साथ वक्त बिताने का मौक़ा मिले.. पर गावं में जाने के १५ दिन में ही सास को बहुत तेज बुखार आया.. दवाईयाँ की पर कुछ फर्क नहीं पड़ रहा था. तो उनको वापस मुंबई लाया गया. खुद की बीमारी से ज्यादा उनको ये दुःख था की नयी दुल्हन को अभी से ये सब परेशानिया आ गई थी..जब मीनू उसके पास पहुंची , तो बस वो,ये ही बात कहे जा रहे थे कि मै क्यों बीमार हुई..और उनका ये सरल स्वभाव देखकर मीनू को बेटी की किस्मत पर गर्व हो रहा था..की उसे कितने अच्छी सासू जी मिली हैं ...
दो घंटे मीनू उनके पास बैठी रही.. फिर जब वो घर जाने लगी तो लिफ्ट बंद होने के कारण उसको सीडिया से नीचे उतरना पडा. ७ मंज़िल उसे उतरनी थी, वो आहिस्ता आहिस्ता सब की तकलीफ़ देखकर वो उतर रही थी. कहीं बेटी माँ के लिये रो रही थी कहीं माँ बेटी के लिये. कितनी तकलीफ़ थी यहाँ सब के चेहरे पर...

जब तक हम घर से बाहर नहीं निकलते हमें पता ही नहीं चलता की कितनी परेशानियाँ है लोगो को..सीडिया उतरते उतरते उसने देखा सामने से तीन आदमी एक महिला का हाथ पकड़ कर उसे आहिस्ता सीडिया चढ़ा रहे थे...मीनू को ऐसा लगा की जैसे उसने उस महिला को कही देखा है.. जैसे जैसे वो लोग नज़दीक आ रहे थे वैसे उसे याद आ रहा था ..और उसे याद आया की ये तो उसकी सहेली जो स्कूल में उसके साथ पढ़ती थी वो स्मिता .. वो चारो उसके बाज़ू में से ऊपर निकल गए..वो बस देखती ही रह गई..उसके मुँह से एक शब्द बाहर ही नहीं आ रहा था
आगे जा कर उसमे से एक पुरुष का ध्यान पीछे मीनू की और गया.. तभी मीनू ने पूछा " ये स्मिता ही है न ?" उसमे से एक पुरुष ने जवाब दिया" हां पर मैंने आपको पहचाना नहीं.."
मीनू ने जवाब दिया " मै और स्मिता स्कूल में साथ में पढ़ते थे.पर उसे ये क्या हुआ है..?"
वो पुरुष ने जवाब दिया " अगर आपको वक्त है तो १० मिनिट ठहरिये ,,मै स्मिता को डॉक्टर के रूम में छोड़कर आऊ.
मीनू ने कहा" ठीक है मै इंतजार कर रही हूँ "
वो तीनों वापस स्मिता को लेकर चलने लगे..
वही ऊपर जा के मीनू एक सीट पर बैठ गई..और उसे अपने स्कूल के दिन याद आ गए.. टीचर को परेशान करना स्मिता का सबसे बड़ा शौक था..सबकी नक़ल करना उसे बखूबी आता था...उसके साथ रजा के दिनों में जुहू बीच पर जाना या पिक्चर देखने जाना और मस्ती करना ये अलग ही बात थी. स्कूलका जीवन ख़तम हुआ और कॉलेज में दोनों की अलग लाइन थी तो अलग कॉलेज में दाख़िला मिला..और जिंदगी में नए दोस्त आ गए..और पुराने दोस्तों को भूलते गए .आज मीनू को अफ़सोस हो रहा था की हम क्यों पुराने दोस्तों की खबर नहीं लेते.. .
अब i वो सोच ही रही थी की बात करने वाला पुरुष जो स्मिता के साथ था वो उसके करीब आया..उसके बाजू में बैठा और उसने बोलने का शरु किया.." मै तो आपको नहीं पहचानता.. पर आपने कहा की स्मिता आपकी स्कूल की दोस्त हैं ....

स्मिता पिछले २० साल से इस हालात से गुज़र रही है.. उसे खुद का भी कोई होश नहीं है..वो क्या कर रही है उसे कुछ पता नहीं चलता..न वो किसीको मुझे भी नहीं पहचानती ..मै उसका पति समीर हूँ
मीनू ने बीच मे ही प्रश्न पूछ लिया की "ऐसा हुआ कैसे?"
समीर ने कहा " हमारी शादी के एक साल में हमें एक बेटा हुआ .. बहुत खुश थी स्मिता..की पहली ही बार में भगवान् ने उसे बेटा दे दिया..पर डेढ़ साल बीतने पर पता चला की बेटा सुन नहीं सकता.फिर पता चला वो बोल भी नहीं सकता..तब तक हमें दूसरा बच्चा होने वाला था.. अब वो दूसरे बच्चे की आशा में जी रही थी..
नौ महीने के बाद दूसरा बेटा आया.. पहले ही दिन से वो उसके आजू बाज़ू बस आवाज करके देख रही थी की वो सुन सकता है या नहीं..पर हमारी किस्मत ख़राब की दूसरे बेटे को भी वो ही तकलीफ आई..और जब स्मिता को ये बात का पता चला वो टूट गई..
और ऐसी बीमार पड़ी की बस वो खुद को ही भूल गई.."
मीनू ने पूछा " तो क्या इस रोग का कोई इलाज नहीं है.."
समीर ने कहा " २० साल से तो मै सिर्फ ये ही काम कर रहा हूँ पर कोई फर्क नहीं..ये जो मेरे साथ थे वो हमारे दो बेटे है..जो बोल और सुन नहीं सकते..पर आज उनकी शादी भी हो गई है..पर मुझे मेरी पत्नी वापस नहीं मिली.."
तभी ही डॉक्टर .ने समीर को आवाज़ दी और कमरे में बुलाया.समीर ने तुरंत एक पेपर में कुछ लिखा और मीनू को देते हुए कहा" ये हमारा पता है, कभी हो सके तो हमारे घर स्मिता के पास बैठने शायद आपको देखकर उसे आपकी स्कूल की बाते याद आ जाए और वो ठीक हो जाए.." इतना कह कर वो डॉक्टर के पास चला गया..
पता हाथ में पकडे मीनू सोच रही थी की कैसा इंसान है ये..खुद ही कहता है की कोई इलाज ही नहीं है..और खुद ही और एक नई आशा को खुद के मन में जन्म दे के गया..शायद ये ही मानव मात्र का स्वभाव है..

Wednesday, October 27, 2010

मालतीबेन सरैया..

आज ८ मार्च जो महिला दिन के नाम से सब मनाते है..१५ दिनों से मालती को कितने फोन आ रहे थे की उनके प्रोग्राम में वो अतिथि -विशेष बनके जाए..पर मालती को ये दिन ही नहीं पसंद था. उसे गुस्सा आता था क्यों ये दिखावा..?
जब कोई पुरुष किसी महिला को कभी सम्मान देता ही नहीं तो भी ये दिन मनाने का ? और उनको सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात से था कि उस प्रोग्राम में पुरुष सदस्य भी होते थे..
पर आज जिनका फोन आया था उन्हें न कहना मुश्किल था.. क्योकि ये ही वो इंसान थे , जिन्होंने अपने पेपर में उनकी पहली कहानी छापी थी और तब से उसे लोगो ने पहचाना था..
फिर वो खुद की शर्तो पे ही वो जाने को तैयार हुई..मालती जानती थी की उसे कही न कही तो जाना ही पडेगा..नहीं तो ऐसे ही फोन आते रहेंगे..
और उसने "स्त्रीत्व संस्था " वालो को हाँ कह दी ..
मालती को पता था वहाँ बहुत बड़े बड़े महानुभाव आएंगे .."स्त्रीत्व सस्था " वालो को भी पता था की मालती सरैया मतलब आग उगलने वाली इंसान ..मालती को खुद को इस बात का अचरज था कि क्यों फिर भी लोग उसे पसंद करते थे.. पर उसने सोचा ठीक है चलो हमें तो अपना काम करना है और निकल जाना है.."स्त्रीत्व सस्था " वालो को भी पता था की अगर किसीको भी पता चल गया की मालती सरैया आने वाली है तो आधे लोग निकल जायेंगे,इसीलिए किसीको बताया नहीं गया था.
शाम हुई .प्रोग्राम का हॉल पूरा भरा हुआ था..ये प्रोग्राम टीवी में लाइव दिखाने वाले थे तो बड़े लोग भी ज्यादा आते थे..मालती सरैया की एंट्री सबसे आखरी में रहती थी.
आखिर प्रोग्राम की शुरुआत हो ही गई.. संचालक ने माइक अपने हाथ में ले के स्त्री शक्ति के बारे में बहुत सारी बाते की..फिर उन्होंने अलग अलग संस्था के प्रमुख को बुलाया..उन्होंने भी अपने प्रवचन दिए..नारियों को किस तरह से आगे बढ़ना चाहिए उस विषय पर बातें की..और नारियो की तारीफ़ करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी..
सब के प्रवचन के बाद संचालक वापस स्टेज पर आये और कहा. अब मै निमंत्रित करता हूँ उस इन्सान को जो एक एक स्त्रियों के दिल में राज करती है.. मै उन्हें आमत्रित करता हूँ की वो आज के दिन अपने विचार प्रगट करे..तो स्वागत है मालती सरैया जी का..
उनका नाम सुनते ही हॉल में बैठी सारी नारियो में से बहुत सी के चहेरे पर ख़ुशी आई और जो अपने पतिदेव के साथ आई थी उनके चहेरे का रंग जैसे उड़ सा गया..क्योकि उन्हें पता था की आज के विषय को देखते वो कैसे मर्दों की हालत करेगी..और उसमे उन्हें ही डांट पड़ेगी..ये ही तो है अपनी भारतीय नारी की मज़बूरी..कि पतिदेव कितना भी गलत कर रहे हो पर उनके खिलाफ वो एक शब्द नहीं बोलती..और न बोलने देती है..
लोगो के बीचो में कानाफूसी शुरू हो गई थी..कितने आदमियों को तो A.C हॉल में बैठे होने के बावजूद पसीना पोछना पडा..
मालती सरैया जैसे ही स्टेज पर आई पूरे हॉल में आते हुए आवाज जैसे थम सी गई . एकदम शांत हो गया पूरा वातावरण.बस उनके चप्पल की एडी की आवाज ही आ रही थी..पूरी श्वेत रंग की सारी में मेरून रंग की बोर्डर वाली साडी ..तना हुआ बदन ..कही से लगता नहीं था की वो ६० साल की महिला थी..
संचालक ने उनका स्वागत हार और श्रीफल से किया..और मालती सरैया को माइक देते हुए कहा की " अब आप अपने शब्दों का उपहार हमें देकर हमारे प्रोग्राम की शोभा बढ़ाइए..
मालती जी ने माइक हाथ में ले कर पूरे हॉल में नजर घुमाई और पुछा" बोलो किस किस को मेरे शब्दों का उपहार चाहिए और किस किस को नहीं " और फिर वो मुस्कराने लगे..
कही से कोई जवाब नहीं आया..
तो उन्होंने बोलना शुरू किया..
" आज महिला दिन, पर मुझे एक बात समझ नहीं आ रही की यहाँ पर बहुत सारे पुरुष वर्ग क्यों शामिल है..यहाँ जिसने प्रोग्राम रखा उन्हें भी मै पूछती हूँ की क्या महिलाओं को पुरुष के हाथो से सन्मान देना ठीक होगा ?"
ये था सब पुरुषो को पहला तमाचा..
" यहाँ पर ज्यादातर पुरुषो को ये लग रहा होगा कि मै यहाँ से उठ के चला जाऊ.. तो जिन्हें ऐसा महसूस हो रहा है वो ख़ुशी से जा सकता है.. पर सिर्फ वो ही लोग जा सकते है जो अपनी पत्नी पर हाथ उठाते हो या दिन रात उनका अपमान करते हो.." अब मालती जी वापस चुप हो गई..और इन्तजार करने लगी की कोई उठ के जाए..
और हॉल में बैठा पुरुष वर्ग सोच में पड़ गया की अगर गए तो यूं लगेगा की हम अपनी पत्नियों को मारते है या उनका अपमान करते है..और अगर नहीं गए तो मालती जी का अपमान सहना है..पर जाने से बेहतर उनको बैठना लगा..
दो मिनिट के इंतज़ार के बाद मालती जी ने वापस माइक उठाया और कहा" चलो लोगो को मेरे से अपमान करवाना शायद ज्यादा पसंद है.."
चलो ठीक है अब हम आज की बात शुरू करे.हम महिला दिन मानते क्यों है ? क्या हम कभी पुरुष दिन मानते है ? और यहाँ जितने पुरुष बैठे है उसमे से ऐसा कोई पुरुष न होगा जो अपनी पत्नी पर गुस्सा नहीं करता होगा..अपमान नहीं करता हो..पर कोई बाहर नहीं गया..और मुझे दुःख इस बात का है किसी पत्नी में भी ये ताकत नहीं थी की वो अपनी पति को कहे की आप बाहर जाओ..आज भी बहुत अच्छे घर के पुरुष महिलाओं पर हाथ उठाते है..और जो शायद ये कहते है की हम हाथ नहीं उठाते है तो पक्का वो शब्दों से उसे जरुर मारते होंगे..पर महिलाए कुछ नहीं कहती ,कारण माता पिता के संस्कार..या वापस जाए तो जाए कहा..?मायके में भी कहा जाता है की हमारे घर पहले ही भरे हुए है ,जैसे तैसे काट डालो ये जिन्दगी..
आप सबको शायद पता नहीं होगा पर आज भी १००% महिलाओं में से ९५% महिलाए बस जिन्दगी पूरी करती है..अगर कोई x-ray मशीन मिल जाये जिससे महिलाओ के मन की बात हम पढ़ सके तो २% महिलाए सन्मान पाती है और दूसरी ३% महिलाए झूठ बोलती है उन्हें सन्मान मिलता है,,और तो भी हम महिला दिन मनाते है..और आज भी मनाएंगे..और हां अगर मै जिन्दा रही तो अगले महिला दिन में मुझे कोई आमंत्रित मत करना..मुझे ये प्रोग्राम में आना बिलकुल पसंद नहीं है..क्योकि यहाँ बोल कर कोई मतलब तो है नहीं..चलो मै रज़ा लेती हूँ
अभी भी हॉल में शमशान सी शांति थी.. और मालती जी ने एक व्यंग भरी मुस्कान के साथ सब के सामने देखा.. तभी ही हॉल में से एक आदमी खडा होके बोला " क्या मै एक सवाल पूछ सकता हु ?"
माल्तीजी खड़ी रही और कहा" वैसे अभी तक मैंने किसी पुरुष को इतना हक नहीं दिया की मुझे कुछ पूछ सके..पर आज हमारा दिन है तो चलो आज आप पूछ लीजिये..पर इतना याद रखना सवाल जाने बिना ही मै कहती हूँ की मेरा जवाब आपको जला देगा फिर मत कहना की माल्तीजी ने ऐसा जवाब दिया..पूछिए.."
मेडम , अभी तक आपने शादी नहीं की उसका कारण क्या ?
क्या आपको कोई पसंद नहीं आया की किसीने आपको पसंद नहीं किया?"
हॉल में से धीमी हंसी की आवाज आई..
माल्तिजी ने हंस के जवाब दिया " भैया बात ये है की..पूरी दुनिया में मुझे ऐसा कोई आदमी ही नहीं मिला जो मेरे शरीर को छुए बिना मुझसे प्रेम करे..अगर तुम्हे कही मिल जाए तो ज़रा भेज देना मै आज भी तैयार हूँ शादी के लिये. "
वो पुरुष सर नीचे करके खडा रह गया माल्तीजी जवाब का इंतज़ार किये बिना चलने लगी लगे..पूरे हॉल में सिर्फ उनके चप्पल की एडी की आवाज सुनाई दे रही थी

Tuesday, March 2, 2010

कड़वी सच्चाई

कहते है के वक़्त ही जख्मो को कम
करता है,
पर – वक़्त ही नए ज़ख्म देता हों तो ?

कहते है की खुश रहने से दुःख कम होते है
पर खुश रहने का कारन ही ना हों तो ?

कहते है बुरे वक़्त में अपनों का साथ शुकून देता है,
पर – अपनों को ही हमारे बुरे वक़्त का पता ना हों तो ?

कहते है प्रेम देने से प्रेम मिलता है ,
पर – प्रेम दे कर भी प्रेम ना मिल पाए तो ?

मैंने सुना है की दुःख बाटने से कम होता है
और
सुख बाटने से बढ़ता है …

अरे दोस्तों पर मैंने तो इसका विपरीत ही देखा , समझा और जाना है …

नीता कोटेचा

Saturday, January 23, 2010

कृपया मुझे समझाइये सही क्या है...

लोगो का कहना है..प्यार कभी कम नहीं होता..हम अपनी उम्मीद बढ़ा देते है..तो मुझे ये समज नहीं आता की जहा प्यार हों वही तो उम्मीद रहती है ना..जहा दुश्मनी हों या झगडे हों वहा कहा उम्मीद होती है..मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा है मै उलझ गई हु...कृपया मुझे समझाइये सही क्या है...

Friday, August 21, 2009



मित्रता में मित्र के १ कदम पर हम ५० कदम बढायेंगे ,
पर -
मित्र के १ कदम पीछे जाने पर हम १०० कदम पीछे हों जायेंगे ...
क्युकी -हम समज गये है की ,
एकतरफा कुछ नहीं होता इस् जीवन में..
जबरजस्ती कुछ नहीं मिलता इस् जीवन में...

Sunday, June 21, 2009

पापा misss uuuuuu

क्या कहे पिता के लिए..
जब उनकी याद भी आती है बस आखे नम हों जाती है..
उनकी तरह कोई संभाल नहीं सकता..
जब माँ मुजे उपवास रखवाती थी,और मुझसे भूख सही ना जाती थी,
तो मुजे सब्जी लेने के बहाने ले जाते थे और नास्ता करवा देते थे..
मै कहेती थी."पापा पाप लगेगा,
तो कहेते थे "तुम्हें नहीं लगेगा .मैंने भगवान से सेटिंग कर ली है .मेरी बेटी का उपवास तुड़वाने की सजा मुजे देना.."
मम्मी को खुश रखने के लिए मैंने ऐसे उपवास बहोत किये.."
शादी के बाद एक बार शाम को थोडा अँधेरा होने के बाद मै सब्जी मार्केट में सब्जी ले रही थी..और वहा पापा ने मुजे देख लिया..
मेरे पास आये हाथ पकडा एक ऑटो बुलाया और मेरे घर का रास्ता बताया ..मैंने कहा
"पापा मुजे सब्जी लेनी है "...कुछ सूना नहीं और घर भेज दिया...
घर में कैसे समजाऊ सासुजी को और पतिदेव को..
तभी थोडी देर में पापा आये ३ थैली भर के सब्जी लाये ..और मेरे पतिदेव को कहा "मुजे पसंद नहीं मेरी बेटी अँधेरा होने के बाद घर से बहार हों..आगे से उसे मत भेजियेगा.."
पतिदेव समज गये और सॉरी कहा..
फिर मेरे सर पे हाथ रखकर बोले "अभी मै जिंदा हु...एक फोन कर देना.."
जब उनका देहांत हुवा उसके अगले दिन हम दोनों अकेले थे कमरे में..उनको पता चल गया था की अब वो नहीं बचेंगे..
मुजे कहेते है..बच्चा तुम सब यहाँ रहोगे.और मुजे अकेले को ऊपर जाना..कुछ कह ना, ऊपर वाले से अगर तेरी ही सुन ले..
मैंने बहोत कहा उपरवाले से पर उसने नहीं सुनी...
और पापा को अकेले जाना पडा..
"पापा आज कहो कहा फोन करू आपको ..आज भी मुजे बहोत तकलीफ है..कितनी बार आकाश की तरफ देखके चिल्लाती हु पापा मुजे कोई नहीं संभालता आप कहा हों..
पर अब वो भी मेरी फरियाद नहीं सुनते..
बस दुआ करुँगी की आप जहा हों..आपको दुनिया की हर ख़ुशी और सुख मिले..
कभी कभी होता है काश ऊपर भी कंप्यूटर होते ..और उनका भी आईडी होता..और कभी उनके नाम की बाजु में भी हरी लाइट होती..और मै खुश हों जाती की पापा आज on line है..
पर सब हम चाहते है ऐसा नहीं होता है ना..
miss uuu papa

Friday, June 19, 2009

कितने मौसम गुज़र गये बारीश के,
तुम्हारे बीना..

ये बार भी थोडा भीग लेंगे वापस,
तुम्हारे बीना ..

लोग समजेंगे नहीं हमारी दिल की तड़प को...
बिताता क्या है मेरे साथ ,तुम्हारे बीना..

बारिश में ना भीगेगा ये जिस्म सिर्फ मेरा..
पर रो लेगा वापस ये दिल भी तुम्हारे बीना...

नीता कोटेचा..
क्यों कहेते है की प्यार अँधा होता है ?
?हमने तो खुली आखों वाले लोगो को ही प्यार में एक दुसरे के लिए मरते देखा,,,

क्यों कहेते है की दोस्त भी कभी धोखा देते है यारो,
हमें तो धोखेबाज भी दोस्त लगते है यारो

क्यों कहेते है की अपने ,सारे बेगाने बन जाते है हर पल
हम तो वो बने हुवे बेगानों को अपना बंनाने में ही जीवन बिता देना चाहते है

क्यों कहेते है लोग की आसु से दर्द का पता चलता है
हमारी हसी में भी लोग दर्द को भाप लेते है.

नीता कोटेचा ..
तुमसे करीब रह कर मै दूर हु तुमसे..
और उससे दूर रहेकर मै करीब हु उससे ..
ये दीवानगी कहो या कहो पागलपन..
ना हम तुम्हारे हों सके ना उसके हों सके...

वो मेरी सासों को छु सकता है...
और तुम मेरे दिल को..
पर ना हम उसके हों सके कभी..
और ना तुम्हें पा सके कभी..
वो मुजे पा कर मेरा ना हों सका.
और तुम दुसरो की अमानत हों फिर भी मुझसे दूर ना हों सके..

चलो अब सिकवा छोड़ दिया है ,
और छोड़ दी है शिकायत करनी...
मै उसकी ना हों सकी..
और तुम मेरे ना हों सके..
तो भी गम नहीं अब...
क्योकि हम तो है सिर्फ तुम्हारे और तुम्हारे हमेशा के लिए...

नीता कोटेचा..
आज तुम्हारे अहेसासो में जीने को जी किया..
आज तुमसे दूर रहेकर तुममे रहेने को जी किया..
हमारे बिच में हों फासले चाहे शहर के या सिलो में पड़े हुवे रंज के ...
हमें तो आज तुम्हें पता भी ना हों ऐसे तुममे खो जाने को जी किया..

नीता कोटेचा.
गम भरी जिन्दगी में अगर एक ख़ुशी भी मिल जाये ,
लगता है जैसे जिन्दगी ने थोडी सी करवट बदल ली..

दोस्त अगर दोस्ती निभाने के अलावा,
अगर थोडा सा प्यार कर ले ..
तो लगता है जिन्दगी ने थोडी सी करवट बदल ली..

हम तो चाहते है पूरी दुनिया को दिल से,
कोई हमें भी चाहेगा ,
तो लगेगा जैसे जिन्दगी ने थोडी सी करवट बदल ली..

हम तो उन्हें याद करते है हर पल..
अगर उन्हें कभी हमारी याद आ जाये ,
तो समजेंगे की जिन्दगी ने थोडी सी करवट बदल ली..

नीता कोटेचा..
संमदर के किनारे मै आज जब बैठती हु..
लहेरो की आवाज में तेरा नाम सुनाई देता है..

जो लहेरो में साथ में मिल कर भीगते थे हम,
आज वो लहेरे हमें अकेले देख कर उदास हों जाती है...

जब साथ में अपना नाम हम लिखते थे रेत में...
और लहेरे आके वो दोनों नाम खुद में समां लेती थी..

आज वो ही लहेरे हमें अकेला देख कर..
तेरा नाम मुजे वापस दे जाती है...

नीता कोटेचा.
लहेरे समंदर की बनाना है मुजे..
दूर हों कर दो घडी
वापस समंदर में ही बसना है मुजे..

पाना है तुम्हें और छुना है तुम्हें,
दूर रहेकर भी हमेशा बसाना है तुममे..

तुम ना समज पाओगे कभी मेरे दिल का हाल..
लहेरो की तरह तुममे से ही बन कर
तुममे समाना है मुजे..

नीता कोटेचा..
उसने प्यार दिया हमें बहोत..
हमने प्यार किया उन्हें बहोत...
एक दिन अचानक उसने मुजे पूछ लिया...
की किस हद तक प्यार करती हों हमें...

हमारा दिल टूट गया..
की इतना जानने के बाद ये सवाल क्यों आया..
और जहा सवाल हों वहा प्यार कैसे रहेगा..

क्योकि जहा प्यार हों सवाल होते ही नहीं..

नीता कोटेचा..
हम से दुरी नहीं सही जाती..
और तुम्हारे करीब हम आ नहीं सकते..

अब डर लग गया है खुद से...
की कही इंतजार में ही हम मर ना जाये..

नीता कोटेचा..
हमने सोचा की तुम भूल गये हो मुझे..
पर बहोत सालो बाद मुलाकात हुई तो तुमने पूछा ..
"हमारी दोस्ती कैसे टूटी थी ज़रा मुझे यादा दिलाना..
हम भूल गये है वो कारण.."
मैंने कहा अरे छोडो वो कारण ..तुम्हें इतना तो याद है की हम भी कभी दोस्त थे..
वो ही काफी है बाकी जिन्दगी जीने के लिए॥

नीता कोटेचा
तेरी मेरी दोस्ती की बाते कितनी करू..
तेरे नाराज होने के किस्से, किससे कहू...

ए दोस्त तुजे तो पता भी नहीं था ..
पर तेरे नाराज होने से मेरा दिल बहोत रोता था..
वो मेरे जज्बात की बाते अब किससे कहू..

तू जब मेरा अपना था..
तब तू कितना पास था...
आज जब तू बेगाना है..
फिर तू और ज्यादा पास है..
ये दिल की अजीब हालत की बाते, बता मै किस्स्से कहू ..

जा तू नाराज तो नाराज सही..
तू दूर तो दूर ही सही...
आज भी मेरे दिल के सिहासन पे तुम ही बैठो हों...
वो बाते वा हालत बता मै किस्से कहू...

नीता कोटेचा
तेरे दिल में रहेने की आरजू थी मेरी..
तेरे करीब रहेने की आरजू थी मेरी ..

तू तू ना रहा..
मै मै ना रही..
तू बेगाना हों गया..
मै किसीकी ना हों सकी...

जा रे दोस्त तुजसे क्यों कहेती हु मै दिल की बाते...
तू प्रेमी ना रहा मेरा..
और ना ही बेवफा बना मेरा..

तुजे बददुआ भी कैसे दू मेरे दोस्त...
क्योकि भले तू ना रहा मेरा..
पर मै तेरी रही हर पल...

नीता कोटेचा
कभी कभी उनकी याद इतना सताती है...
आखों से आसु नहीं आग बरसती है...
डर है की ये आग में कही वो बेवफा जल ना जाये..
इसीलिए ये पलके हर दम जुका रखी है...

नीता कोटेचा..
इस तरह तुजे प्यार किया है मैंने..
जैसे एक भक्त करता है भगवाना से प्यार..
तू ही मेरी जिन्दगी है..
तू ही मेरी बंदगी है...
तू ही मेरा प्यार है..
और तू ही सर्वस्व है...
एक दुसरे के साथी बने ..
एक दुसरे के बने संगी...
बस तू है तो सब कुछ है..
नहीं तो हम है दुखी..
तुम जब होते नहीं पास..
ये दिल रोता है बहोत..
और जब होते हों करीब..
जीवन होता है खुश..
ए मेरे साथी ..
एक बात कहेती हु तुमसे मै आज..
तू ही मेरा जीवन है
और
तू ही मेरा प्यार..
तुजसे ही मेरा जीवन है..
और
तू ही मेरा भगवान..
तेरे दिल में रहेने की आरजू थी मेरी..
तेरे करीब रहेने की आरजू थी मेरी ..
तू तू ना रहा..
मै मै ना रही..
तू बेगाना हों गया..
मै किसीकी ना हों सकी...
जा रे दोस्त तुजसे क्यों कहेती हु मै दिल की बाते...
तू प्रेमी ना रहा मेरा..
और ना ही बेवफा बना मेरा..

तुजे बद्दुआ भी कैसे दू मेरे दोस्त...
क्योकि भले तू ना रहा मेरा..
पर मै तेरी रही हर पल...

नीता कोटेचा

Thursday, June 4, 2009

ये दिल फुट फुट कर कभी रोना चाहता है...
और आखों को इजाजत भी नहीं होती ...की वो रोए..
इतनी गुलामी से जीना पड़ता है अपनी ही जिन्दगी को...
के अगर जीना हों खुद की सुबह हमें...
तो भी पूछना पड़ता है अगर तुम कहो तो आख खोले...


नीता कोटेचा
जब भी देखती हु चारो और..
खुद को अकेला ही पाती हु...
कितने लोगो को अपना बनाया
और बसाया दिल में सब को..
पर कोई करीब नहीं...
कोई अपना नहीं..
जैसे हम पहेले भी अकेले थे
और
आज भी अकेले ही रह गए ...


नीता कोटेचा..

Monday, June 1, 2009

किसे कहे हम अपना ....
किसे कहे बेगाना...
कभी होता है वो बहोत अपना
और
कभी बहोत बेगाना..
करते है हम तो सबसे प्यार...
किसे कहे बेगाना और किसे कहे अपना..

नीता कोटेचा..

Thursday, May 21, 2009

आज भी माँ मुजे डाटती है...
अगर आज भी मै गलत दोस्तों के साथ बात करू मुजे वो उसकी नजरो से डाटती है..
आज भी अगर मै घर में कुछ बोलू वो मुजे बाजु में बिठाकर डाटती है..
आज भी अगर मै मेरे बच्चो को गुस्सा करू , तो मुजे मेरा बचपन याद दिलाकर डाटती है..
कुछ होता है अजीब अगर जिन्दगी में ..मै आज भी चली जाती हु उसके पास..
पता है पहेले डाट पड़ेगी..पर फिर मिलेगा दुलार..
बस माँ ये डाट मेरे पर कायम रखना..
तभी मै सही जिन्दगी जी पाती हु..

नीता कोटेचा
जिन्दगी में शामिल हों गये हों इस तरह मेरी..
की सास नहीं चलती अब तुम्हारी याद बीना..
बस डर है एक khud की किस्मत के कारन...
की कही खो ना दू तुम्हें भी सब लोगो की तरह...

नीता कोटेचा.
ये वो ही जगह है , जहा हम जुदा हुवे थे...
तुम तब भी बहोत खुश थे..
तुम आज भी बहोत खुश हों..

नीता कोटेचा..
अरे तेरे नाम से मेरी सास चल रही है ..मैंने कभी ऐसा भी सोचा था..
देखो तुमसे बिछडे हुवे बरसो बीत गये, हम आज भी जिंदा है ....

नीता कोटेचा...
मुझे भूल सको तो बहोत अच्छा..
पर ना भूल सको तो कहेना मुजे,
बेवफा बनके मै मदद करुँगी तुम्हारी...

नीता कोटेचा..
कोई यहाँ मिलता है..और कोई bichad जाता है...
कोई यहाँ सच्चा है और कोई यहाँ जूठा है...
पता नहीं चलता की लोगो को प्यार करे की नहीं...
क्योकि कोई यहाँ अपना है कोई पराया है....

नीता कोटेचा...
आखिर सबसे ज्यादा रिश्ते ही दर्द देते है..क्योकि वो रिश्ते है ना...
और उससे ये दिल बहोत उदास होता है..क्योकि वो हमारा दिल है ना.
एक बार टूटे तो हम जोड़ने का भी प्रयत्न नहीं करते...
क्योकि वो हम है ना..

नीता कोटेचा...
प्यार आख का आंसू है ..
और प्यार दिल की धड़कन है...
पर प्यार मत करो दोस्तों, किसी से दुनिया में ..
क्योकि
प्यार ही धीमा जहेर है...

नीता कोटेचा
प्यार ने बहोत रुलाया दोस्तों ..
और प्यार ने बहोत तरसाया दोस्तों ...
अब ना चाहिए किसीका प्यार हमें दोस्तों ...
क्योकि प्यार ने बहोत कुछ सिखाया दोस्तों...

नीता कोटेचा..
कभी जब दोस्तों से धोखा मिलता है हम समजते है की हमने लोगो को पहेचाना नहीं..
पर ऐसा नहीं ..सही बात ये है की हमने खुद को ही पहेचाना नहीं...

नीता कोटेचा
रास्ते वो है..अहेसास वो है..याद वो है आज भी ताजा..
बस तू नहीं कही...और अब तो हमें तुम्हारी तलाश भी नहीं ...
बस तुम्हारी यादे ही काफी है ...हमें जीवन बिताने के लिए..

नीता कोटेचा..
जहा देखती हु तुम ही तुम नजर आते हों...
कैसे हों तुम की बेवफा हों कर भी दिल से दूर नहीं हों..

नीता कोटेचा..
वो हमें करते है प्यार बहोत ..पर जब उनको समय हों तब...
और
हम प्यार करते है उनको इतना...
जब जब हम सास लेते है...
और हर पल.
बस उनको पाना चाहते है..

नीता कोटेचा..
अफसाने बने या ना बने मेरे जाने के बाद भी...
पर हम तो तुम्हारे दिल में थे
और
हमेशा रहेंगे हमारे के जाने के बाद भी...

नीता कोटेचा..
तुमसे दूर होने का अहेसास कर पाना अब तो मुश्किल है...
इससे अच्छा है की हम मौत की गोद में सो जाए..

नीता कोटेचा.
TO JEET, ANNU, NIRU...RASHMIJI , ANNURADHA,KAVITA, DAISY ..AUR BAHOT SARE DOSTO KE LIYE...

कभी कभी कोई संत महात्माओ की बड़ी बड़ी बातें हमारी समझ के बाहर होती है . पर एक दोस्त का समझाना जिन्दगी जीने का तरीका बदल देता है .

नीता कोटेचा..
firoz kahan abhi ye soch rahe honge...

मरने के बाद ही लोगो ने मुझे याद किया..
नहीं तो कोई तस्वीर भी देखता नहीं था हमारी बहोत अरसे से...

नीता कोटेचा..
दोस्ती कैसे निभाई जाये कोई हमसे पूछे..
दिलो जान से चाहना किसे कहेते है कोई हमसे पूछे..
इंतजार में गंतो दिन महीनो ही नहीं..
पर जन्मो तक कैसे इंतजार किया जाये कोई हमसे पूछे...

नीता कोटेचा..
अचानक कोई सामने से आके हस देता है..ना जान ना पहेचान...अचानक कभी कोई मदद कर देता है...जब हम कोई टिकिट की बड़ी सी लम्बी कतार में खड़े हों और अचानक कोई आ कर कहे हमें, की मैंने ये कूपन लिया है ज्यादा है क्या आपको चाहिए... कभी कोए आ कर कहेता है की मुझे ऐसा क्यों लगता है की मैंने आपको कही देखा हुवा ऐसा महेसुस होता है...और हमारे दिल के तार भी हिल जाते है॥कभी कुछ काम कर रहे हों तो ऐसा होता है की ये काम हमने पहेले भी तो किया हुवा है...कभी कोई ऐसी जगह पे जहा हम जाते है जहा पहेली ही बार गये हों पर ऐसा लगता है मै याहा आ गई हु पहेले ... पहेले नेट का कोई विश्व था ऐसा हमें पता नहीं था..पर अब ऑनलाइन हमारे बहोत सारे दोस्त है..ऑरकुट में लाखो लोग है..हम क्यों उसमे से १०० को अपना बनाते है..और उसमे से भी क्यों हम सिर्फ १० से महोब्बात करने लगते है...उसके दुःख से हम दुखी होते है..और उसके सुख से हम सुखी होते है..क्यों एक ही के घर में रह रहे लोग एक दुसरे से बहोत दूर होते है और बहोत दूर रहेने वाले लोग दिल के करीब होते है.. क्या आपको इससे सवाल नहीं होते दिल में ऐसा क्यों होता है हमारे साथ ??
क्यों कभी कोई अपना लगने लगता है..क्यों कभी कोई अपना लगने लगता है..और कोई पराया..क्या इसमें कही कोई जन्म की लेनदेन बाकि रह गई होती है...मै ये मानती हु की हा ऐसा ही है..हमारा अगर किसी जनम का लेनदेन बाकी हों तो ही हम एक दुसरे के सामने मुस्करा लेते है...नहीं तो मुस्कराना भी मुश्किल होता है..तो मै मानती हु की हा कुछ है जिसे हम पुनर्जनम कह सकते है...क्या आप मानते है??