Friday, February 6, 2009

वाह रे इन्सान तुम्हें क्या कहू मै.

मुझे शक्ति दे हे प्रभु की मै अपने आजू बाजु की बुराइयों को सह सकू..
मिटाना तो मेरी बस की बात नहीं..
तो अब एक ही रास्ता बचा है की मै उसमे ही जीना सिख लू..
पर क्या ये मेरा सही स्वाभाव है...
तो क्यों देते है हम सब को लालच और लाच ...
क्यों हम ही गंदकी फैलाते है और कहेते है अपने देश में तो कुछ है ही नहीं...
हम इतने ख़राब क्यों है की अपनी ही धरती को हम पहेले गन्दा भी करते है और फिर गाली भी...देते है
वाह रे इन्सान तुम्हें क्या कहू मै..

नीता कोटेचा..