संमदर के किनारे मै आज जब बैठती हु..
लहेरो की आवाज में तेरा नाम सुनाई देता है..
जो लहेरो में साथ में मिल कर भीगते थे हम,
आज वो लहेरे हमें अकेले देख कर उदास हों जाती है...
जब साथ में अपना नाम हम लिखते थे रेत में...
और लहेरे आके वो दोनों नाम खुद में समां लेती थी..
आज वो ही लहेरे हमें अकेला देख कर..
तेरा नाम मुजे वापस दे जाती है...
नीता कोटेचा.
लहेरो की आवाज में तेरा नाम सुनाई देता है..
जो लहेरो में साथ में मिल कर भीगते थे हम,
आज वो लहेरे हमें अकेले देख कर उदास हों जाती है...
जब साथ में अपना नाम हम लिखते थे रेत में...
और लहेरे आके वो दोनों नाम खुद में समां लेती थी..
आज वो ही लहेरे हमें अकेला देख कर..
तेरा नाम मुजे वापस दे जाती है...
नीता कोटेचा.
5 comments:
wow!!! what a beautiful composition......... really you write too well in both gujarati and hindi......aameen
bahut sunder bhav hain
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