बचपन की वो कड़वी यादे ..लेकर बड़े हुवे...
तो लगता था,
कि
अपना होगा घर..
और अपने होंगे बच्चे...
और हम जियेंगे अपनी तरह..
ना किसीकी डाट सुनने कि ..न कभी फटकार सुनने कि..
अब तो मै जियूंगी अपनी तरह...
पूरा आकाश मेरा और पूरी धरती मेरी...
पर जैसे जैसे बचपन बिछड़ता गया.
पता चला कि वो कड़वी यादे कितनी मीठी थी...
नीता कोटेचा
तो लगता था,
कि
अपना होगा घर..
और अपने होंगे बच्चे...
और हम जियेंगे अपनी तरह..
ना किसीकी डाट सुनने कि ..न कभी फटकार सुनने कि..
अब तो मै जियूंगी अपनी तरह...
पूरा आकाश मेरा और पूरी धरती मेरी...
पर जैसे जैसे बचपन बिछड़ता गया.
पता चला कि वो कड़वी यादे कितनी मीठी थी...
नीता कोटेचा
7 comments:
Agar jiwan main kadwahat na ho to meethe ki pehchaan nahi hoti...
BAhot hi sundar lekhni hai aapki...
aabhi to bachpan yaad aa raha hai aur bachpan meetha lag raha hai per baad me(budhape me) aaj ke din meethe lagenge.
बचपन की यादों को बहुत खूबसूरती से लिखा है
........वक़्त गुजर जाने पर लगता है....
ek vat kahu didi mane to bachpan e vakhte pan mithu lagtu hatu ane atyare to vadhu mithu lage che..pan hu to man fave tyare bachpan ne vagoli lau chu mara dikra sathe masti kari ena bachpan ma maru bachpan mane pachu mali jay che..etle hu to actually aa mamle nil j chu..pan tame lakhyu che khub sundar....gr88888888
yaade na jaye bite dinoki
hmmm aapne mere bhavo ko shabd de diye.bahut hi umda
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