Wednesday, April 8, 2009

अगर कोई अपना बनना न चाहे तो उस जबरदस्ती मत करो...
वो प्यार का कोई मतलब नहीं रहेता...

नीता कोटेचा..
कांटे चुभते है ..तभी तो फूलो का स्पर्श सुखद लगता है ..
नहीं तो कौन यहाँ दिल वालो की कदर करता है...

नीताकोटेचा

Monday, March 30, 2009

सबसे पहेली बात मै ये कहेना चाहूंगी की मेरी हिंदी ज्यादा अच्छी नही है..पर मेरे हिंदी भाषी दोस्तों ने कहा की नीता तुम्हारी कहनिया हम कैसे पढ़ सकेंगे ,हमें तो गुजराती आती ही नही ..तो अगर तुम उसे हिंदी में लीखो तो ज्यादा बहेतर होगा..तो आज पहेली बार कोशीश कर रही हु ..तो अगर ग़लत हिंदी हो तो मुझे क्षमा कर दीजियेगा
और उसे थोडा बरोबर करके पढियेगा॥[:)]
और दूसरी बात मेरी सारी बाते सत्य बात होती है..कोई काल्पनिक बातो को मै नही लिख सकती..सब देखी हुई बातें है..ये भी एक सत्य बात ही रजु की हुई है..

१)

"हे भगवान आज वापस जगडे ,पता नही ये दोनों को क्या है ??ना उपरवाले ने बच्चे दिए है की उनके कारण कभी जगडे हो ..पर ये दोनों अकेले रहेते है..पर शाँति से जी नही सकते."वनिता ने अपने पति अमर को कहा..
"अरे पर तुम्हे क्या? देखना अभी थोडी देर में भाभी यहाँ आयेंगे और क्या क्या हुवा उनके घर में वो सब तुम्हे बताएँगे..नही तो उन्हें भी कहा तब तक शाँति मिलेगी "वनिता के पति अमर ने कहा..
और वो ही हुवा ..दस मिनिट में भारती भाभी आए ..और वनिता के बाजू में बैठके रोने लगे ॥
वनिता ने कहा' भाभी रोइए मत ॥ तुम्हे तो मालुम है न की शैलेश भाई के मन में कुछ नही होता..रातको घर पे आयेंगे तब उन्हें तो यादा भी नही होगा। की सुबह जगडा हुवा था॥"
तभी भारती भाभी ने कहा"हां वनीता ठीक है ,उनको याद नही रहेता..पर रोज ऑफिस जाते वकत वो जगडा करके जाते है..और ख़ुद तो रातको हसते हुवे आयेंगे पर मै पूरा दिन वो ही खयालो में बिताती हु..और जान जलाती रहेती हु..कब वो सुधरेंगे वनीता॥"
वापस वनीता ने उन्हें समाजाने की कोशिश की "भाभी देखिये ,आदमी लोग भी तो पूरा घर चलाते है..पुरी जिंदगी बहार काम करने जाते है,उनको कैसे कैसे लोगो से बातें सुननी पड़ती है..तो अब वो गुस्सा घर वालो पे ही निकालेंगे..हमें कहा ज्यादा देर उनका गुस्सा सहेना है..देखो अभी चले गए तो रातको आएंगे..भूल जाइए ..और चलो अभी मै आती हु आपके घर में ,साथ में मिल के खाना खाते है॥"
इस बिच अमर एक ग्लास पानी भरके भारती भाभी को दे के गया..और वनीता के सामने चोरी से थोडा हस ही लिया..क्योकि ये रोज का क्रम ही हो गया था सब कुछ...
भारती भाभी घर पे गए ..और थोडी देर में वनीता के घर का फोन बजा।
वनीता ने फोन उठाया ..तो सामने शैलेश भाई थे.शैलेश ने कहा "क्या भाभी ,वनीता का प्रोग्राम ख़तम हुवा की नही..गई वो घर पे..अगर आपके घर में है तो कुछ मत बोलिएगा..मै बाद में फोन करूँगा..."और शैलेश भाई हस रहे थे॥"
वनीता ने कहा "क्यों शैलेश भाई आप उसे रोज परेशान करके जाते हो और ऊपर से हस रहे हो..यहाँ उनकी जान निकल जाती है रो रो के..मै ही आज आपको फोन करने वाली थी.. "
अभी तक शैलेश जो हस रहा था, वो अचानक चुप हो गया ..और उसने कहा.."भाभी ,अगर मै उससे जगडा करके नही जाउंगा.तो भी वो रोने वाली तो है ही..वो हमें बच्चे नही है उसके लिए रोएगी..ये तो मै जगडा करके जाता हु तो कमसेकम विषय तो बदली होता है..वो कारण से रोए.. इससे अच्छा है मेरे जगडे के कारण रोए....मै तो रातको आके मना ही लूँगा न उसे..चलो अब मै फोन रखता हु, जरा उसे संभालना.."
और सामने से फोन बंध हो गया..
और वनीता सोच में पड गई की शैलेश भाई कितना प्यार करते है भाभी से ,कितना दूर का सोचते है..मुझे तो ये ख़याल भी नही आया॥
ऐसे ही भारती को सँभालते संभालते शाम हो गई ..सब अपने काम में व्यस्त हो गए।
रात को ८ बजे भारती भाभी आए ..और वनीता से कहा देखो देखो...आज तुम्हारे भाई साहेब हमारे लिए कितनी प्यारी सारी ले के आए..और जैसे सुबह कुछ हुवा ही नही था इस तरह से वो वनीता से बाते करने लगी॥
और वनीता भी दिल में मुस्करा रही थी।और सोच रही थी की ये कैसा संसार है..कभी हमें उसी आदमी के लिए ये ख़याल आते है की हम क्यों जीते है इसके साथ।?? और कभी वो ही आदमी हमें कितना संभालता है..कितनी बार हमारी सोच बदलती है..
ऐसे ही दुसरे ६ महीने बीत गए।
एक बार रातको १ बजे अचानक जोर जोर से बेल बजने की आवाज आई ..वनीता और अमर भी डर गए की ये वक्त कौन आ सकता है..दोनों ने दरवाजा खोला.तो भारती भाभी रोते रोते खड़े थे..और बोल रहे थे "वनीता जल्दी चलो तुम्हारे भाई को कुछ हो गया है॥"
वनीता और अमर दौड़ के उनके साथ गए॥
वहा जाके देखा तो शैलेश भाई जमीन पे गीरे हुवे थे।
उन्होंने तुंरत डॉ। को फोन किया..और डॉ। ने आके कहा की "शैलेश भाई अब इस दुनिया में नही रहे.. "
और भारती भाभी पे तो जैसे आसमान टूट पडा..उनको संभाला नही जा रहा था वनीता से॥
भारती भाभी रोते रोते बोल रहे थे की वनीता इनसे कहो की मेरे साथ जगडा करे..ऐसे चुप ना रहे॥
मै नही जी सकती इनके जगडे के बिना॥
वनीता को पता नही चल रहा था की कैसे संभाले .. भारती भाभी को॥
अमर ने उनके सब रिश्तेदारो को फोन किया.सब को आते आते सुबह हो गई.
मुशकिल से भारती भाभी ने शैलेश भाई की अंतिम यात्रा निकालने दी.
पर अभी भी भारती भाभी एक ही बात बोल रहे थे ..वनीता अब मै कैसे जीयूँगी उनके बिना.कौन मेरे साथ जगडा करेगा..और कौन मुझे प्यार करेगा॥
वनीता से उनकी बातें बर्दास्त नही हो रही थी..और साथ में शैलेश भाई ने जो उसे फोन पे बताया था.वो सब याद आ रहा था ..
वो दूसरी रात वनीता ने सोचा की आज इनके पास ही सो जाती हु..और वो भारती भाभी के घर ही रुक गई॥
सुबह वो उठी तो अभी भरती भाभी सो रहे थे..तो उसने सोचा चलो मै थोड़ा कम करके आऊ घर का..फ़िर वापस आती हु और भाभी के साथ ही रहूंगी...
और वनीता अपने घर गई..करीब १ गंटे बाद वो वापस आई तो देखा की भारती भाभी अभी भी सो रहे थे॥
अब उसे लगा उनको उठा देना चाहिए॥
और वो उनको उठाने उनके करीब गई..और जैसे उसने भारती भाभी को छुवा ..उनका बदन एकदम ठंडा था।
वो एक रात भी शैलेश भाई के बिना नही काट सके..





इस तरह खामोश रह कर बिताई है जिन्दगी मैंने..
की मेरी धडकनों को भी पता नहीं, दिल रो रहा है..

नीता कोटेचा
ख्यालो में कहा वो तो धड़कन में है..
एक एक सास में जैसे उनकी खुशबु है..

नीता कोटेचा..
शिकायत करनी न आई तो लोगो ने समजा दर्द नहीं है..
और आसु में हम खुद को डुबोते चले गये..
ना उन्हें पता चला की हम तड़पते है उनके लिए ...
और naa हमने बताना जरुरी समजा..
क्यों कुछ बोलके बताये की ,कितना प्यार है हमें तुमसे..
हमारे जनाजे पे आके देख लेना..
वहा भी तुम्हें हमारे प्यार का अहेसास मिल ही जायेगा..

नीता कोटेचा.

Tuesday, March 10, 2009

मेरी माँ

मैंने एक बार माँ से कहा :माँ मुझे अपनी गोद में सुला लो..
मै थक गई यहाँ की मतलबी दुनिया से और मतलबी लोगो से.."
तो माँ ने कहा"बेटा, ये तो वो लोग है जो जिन्दगी जीना सिखाते है..
मै कैसे तुम्हें उनसे दूर रखु..तुम फिर कभी लड़ ना पोगी.."
तो मैंने कहा "माँ मुझे नहीं लड़ना इन लोगो से जो मेरे नहीं है पर मेरे होने का अहेसास जताते है.."
तो माँ ने कहा" ये अहेसास ही काफी है, यहाँ तो लोगो को मतलबी लोग भी नहीं मीलते..
तुम जियो इन्ही के बिचमे..
तब ही तुम सिख पोगी दुनिया में जीना.."
मै नाराज़ हो के चल रही थी तब माँ ने कहा..
"जाओ मत दो पल सो जाओ मेरी गोद में..इससे तुमसे ज्यादा मुझे सुकून मिलेगा..मै मतलबी नहीं ..मै तो एक ऐसी इन्सान हु तुम्हारी जिन्दगी की जो हर बार मुश्किलों में सर पे हाथ रखकर मुश्किलों से लड़ना सिखायेगी.."

और माँ देखो ,आज मुझे सब मतलबी ओ के बिचमे भी अपनापन ढूंढना आ गया..

नीता कोटेचा.

Saturday, March 7, 2009

कितना अजीब लगता है मुझे तो ये शब्द ही महिला दिवस..
साल में एक दिन मनाओ और उसमे भी सभी महिलाए खुश..
जैसे उनमे तो अक्कल ही नहीं है न...
आज भी उनको सुनना पड़ता है की कमाने की लालच में तुमने अपना स्त्रीत्व गुमा दिया है ..
पहेले से प्रथा चली आती थी की पुरुष घर के बहार जा कर कमाता था और नारी घर को संभालती थी..
पहेले जब कोई रिश्ता आता तो पहेले पूछा जाता था की आपके दादा कौन थे ..आपके मामा कौन है...अभी तो शादी के लिए रिश्ते आते है तो पूछा जाता है की आपकी बेटी कौन सी कंपनी में काम करती है कितना पगार है ..
ये है सुधरा हुवा समाज ..
अरे क्यों मनाते है ये दिन..
जब की आज भी भाई के ..या पापा के या फिर पति के मुड के ऊपर स्त्री ओ का दिन अच्छा जायेगा या बुरा जायेगा ये तय होता है...
जैसे नारी पहेले gulaam थी उतनी ही आज भी है..
आज भी टीवी में बालिका बधू और लाडो जैसी सीरियल दिखाते है मतलब की कही ऐसा हो रहा है वो सही है..और वो ही सोच के बुरा लगता hai ..
एक बेटी जब २१ सल् की होती है तो आज भी सब बाजू से आवाजे आने लगती है की अब कितना इंतजार करोगे ..शादी तय कर लो..जैसे शादी के अलावा जिन्दगी का कोई हेतु ही नहीं है दूसरा..

क्यों ये सब दिखावा होने देते है हाम मुझे वो ही पता नहीं चलता.
आज का दिन है जब हम ये दिन का विरोध करके अपना आक्रोश जता सकते है...
लोग मुझे कहेते है की नीता तुम क्यों इतना कड़वा बोलती हो...
पर मुझसे ये आडंबर की दुनिया नहीं सही जाती है...
मै नहीं मना सकती जूठ मुठ के दिन, क्या करू??
अगर हम नारियाँ एक हो जाए तो किसी भी पुरुष में इतनी शक्ति नहीं की हमें परेशान कर सके..
और ये शुरुआत हर सास और बहु को करनी है...

Tuesday, March 3, 2009

मुजमे मै समाया हुवा हु ,
पर खुद को ही कभी मिलता नहीं मै..
यादो की दस्तक और इंतजार की दस्तक ,
उसी में मै ढूंढ़ता हु खुद को ...


नीता कोटेचा

Monday, March 2, 2009

बचपन की वो कड़वी यादे

बचपन की वो कड़वी यादे ..लेकर बड़े हुवे...
तो लगता था,
कि
अपना होगा घर..
और अपने होंगे बच्चे...
और हम जियेंगे अपनी तरह..
ना किसीकी डाट सुनने कि ..न कभी फटकार सुनने कि..
अब तो मै जियूंगी अपनी तरह...
पूरा आकाश मेरा और पूरी धरती मेरी...
पर जैसे जैसे बचपन बिछड़ता गया.
पता चला कि वो कड़वी यादे कितनी मीठी थी...

नीता कोटेचा

Monday, February 16, 2009

ए खुदा, तेरी महेफिल में हम ये फरियाद करते है..
उन सब को खुश रखना जो तुम्हें याद करते है..

तेरी महेफिल में सर जुकाया हमने इसलिए
क्योकि तेरे बनाए हुवे जहा को तेरे ही लोग रोंद रहे है..

हमने कहा वो सबको खुश रखना जो तुम्हें याद करते है..
तो ए खुदा मुझे इतना बता दे की जो तुम्हें याद करते है
वो
ऐसे कैसे होते है...
की लोगो का खून भी बहेता है तो उनको कोई फरक नहीं पड़ता.

अब क्या कहू ए खुदा ऐसे लोगो के लिए..
पर हम तो तेरे सच्चे बन्दे है...
तो ये ही दुआ करते है
की
कैसा भी हो वो..
पर
उन सब को खुश रखना जो तुम्हें याद करते है..

नीता कोटेचा..

Sunday, February 15, 2009

दिल में हो सुकून तो दिन में तारे लगते है..
और जो हो बेचेनी तो अपने भी पराये लगते है...
खुद ही खुद की छबी देखके ,
खुद को भी पहेचानते नहीं हम..
क्योकि जब खुदा हो रूठा तो
चलती सास भी भारी लगती है..

नीता कोटेचा
जब से तुम्हें दिल में बसाया हमने ,
हसना भूल गये और रोना भी भूल गये..

दुनिया ने इस तरह से सताया की तुम्हें भूलना भूल गये..

पल पल उन्होंने दिए ताने तुम्हारे नाम से ,
की तुम एक पल दूर न हो सके मुझसे..

दूर हो गये हो हर पल के लिए मुझसे..
पर यु दिल में बसे हो जैसे एक ,

चुभता हुवा नासूर जो मीठा लगता हो..

नीता कोटेचा
प्रेम मौन है ..अगर हल्ला हो तो वो प्रेम नही, शायद है दिखावा..

प्रेम लेना नही ..प्रेम देना है..अगर उसमे उम्मीद कि,तो ज्यादा टिकता नहीं ...

प्रेम में भूल जाना है दुनिया को..बस सिर्फ प्रेम करना है एक दूजे को..

गलती देखनी नहीं है दूजे की..ये प्रेम नहीं है
पर
गलतिया दिखती ही नहीं दूजे कि,
इसे ही सच्चा प्रेम कहेते है (मेरे विचारों से..)

नीता कोटेचा

शरीर या सिर्फ आत्मा.

अगर मै आत्मा हु तो मै रोता नहीं हु ..
और
अगर मै अभी भी शरीर हु,
तो हा मै रोता हु..
बहार से भी और अन्दर से भी...
और वो रोना कभी भी बंध नहीं होगा..
खुद तलाशिये खुद में की हम क्या है...
शरीर या सिर्फ आत्मा. ...

नीता कोटेचा..

Monday, February 9, 2009


नमस्ते दोस्तों॥
मै आपकी दुनिया में पहेली बार प्रवेश कर रही हु...मेरा नाम यशोदा पलन ..मै लेखिका और कवियत्री हु ..मेरी दो पुस्तक गुजराती में प्रकाशित हुई है ....
अगर आप मुझसे मिले होते तो आपको ऐसा लगता की ये कैसे लिखति होगी?क्योकि मै फिजिकली hendIkep हु ..सात सल् की आयु से ही रुमेटोइड आर्थ्राईटीस नामकी बिमारी मुझे हो गई थी...तब से मै बिस्तर पे ही हु...दोनों पैर गुटने से मुड़ते ही नही है ..दाहिना हाथ सीधा ही रहेता है और उसी हाथ की दो पहेली उंगलिया
हमेशा मुडी हुई रहेती है..और वो ही मुडी हुई उंगलिया के बिच्मेही पेन पकड़ कर लिखति हु ..इतने सालो से ऐसे ही कहानिया लिखके ,लेख लिखके जो मिलता था उससे घर चलता था। मतलब खाना मिल जता था..पर अबा मेरी आखो का रेटिना दुर्बल हो गया है..और आखो की रौशनी को बचाने के लिए मुझे डर दो महीने में एक बार इंजेक्शन लेना पडेगा..डॉ ..कम करके भी मुझसे ५०००/ एक इंजेक्शन का कह रहे है..एक साल का ६ इंजेक्शन मतलब ३०,००० Rs ..जो अब मेरे बस की बात नही रही..पर आख़ ही मेरा जीवन है...तो क्या आप मुझे मेरी आखों को बचाने के लिए मदद कर सकते हो???
अगर किसीको भी मुझसे मिलना है तो नीता आपको मेरे घर तक जरुर ले आएगी॥
मेरा add ॥

यशोदा पलन
डी लोहाना परिषद्
पहेला माला ,रूम नम्बर ३९.. एन एस रोड
मुलुंड वेस्ट
मुंबई ..४०००८०
मेरे डॉ..का नाम है

डॉ.गौरांग शाह
9820047411॥

अगर नीता को कुश संदेश देना है तो उसका id है॥

neetakotecha.1968@gmail.com


Friday, February 6, 2009

वाह रे इन्सान तुम्हें क्या कहू मै.

मुझे शक्ति दे हे प्रभु की मै अपने आजू बाजु की बुराइयों को सह सकू..
मिटाना तो मेरी बस की बात नहीं..
तो अब एक ही रास्ता बचा है की मै उसमे ही जीना सिख लू..
पर क्या ये मेरा सही स्वाभाव है...
तो क्यों देते है हम सब को लालच और लाच ...
क्यों हम ही गंदकी फैलाते है और कहेते है अपने देश में तो कुछ है ही नहीं...
हम इतने ख़राब क्यों है की अपनी ही धरती को हम पहेले गन्दा भी करते है और फिर गाली भी...देते है
वाह रे इन्सान तुम्हें क्या कहू मै..

नीता कोटेचा..

Friday, January 30, 2009

पता न चला

यु ही दिल के साथ गुफ्तगू में रात कहा बीत गई पता न चला ..
हम ढूंढ़ते ही रह गये उनकों, और उन्हें पता न चला..

कितना इंतजार किया उनकी गली में खड़े हो कर..
वो पास से गुजर गये और हमारा उन्हें पता ही न चला.

वो कहेते है की हमें उनकी याद न आती है कभी..
पर उनकी याद में हम रोज मरे ,और उनको ये मालूम भी न पडा.

चलो अब तो शिकायत ही करनी छोड़ दी है ..
क्योकि हम महोब्बत करते है उनको ,ये ही उनको पता न चला..

नीता कोटेचा.

Sunday, January 25, 2009




माँ के पल्लू में जो शुकुन मिलता है उसका अनुभव क्या होता है ..वो वो बच्चा ही बता सकता है..
और माँ के पल्लू को तार तार होने से बचाने में जो शुकून मिलता है वो अनुभव वो जवानो से पूछो जो ये भारत माता को संभालते है...वो पल्लू पे किसी बुरे आदमी का पैर न पड़े ..वो पल्लू में कही किसी अपने ही बेटे के खून का धब्बा न लगे ये सब बातो का ध्यान वो जवान करते है...बहोत लोगो के मुह से सूना है की कहा अब वो सोने की चिड़िया और कहा अब वो भगतसिंग जैसे जवान...मुझे बहोत दुःख होता है ये सुनकर की लोगो को सिर्फ बाते करनी आती है...२ आतंक वादी ओ के लिए क्यों कोई सादा इन्सान न गया??...क्यों जवान को ही बुलाना पडा था...हम अपने बच्चो को रास्ता पार करने नहीं देते अकेले..वो माँ के बारे में सोचो जो अपने बच्चो को हसी ख़ुशी सरहद पे भेजती है..की जा बेटा मर जाना पर भारत माता की लाज रखना...लोग कहेते है की सबसे बुरा भारत देश है..पर मै जब लोगो से बात करती हु तो पता चलता है की कितनी परेशानी होती है बाहारगाव के देशो से...
माना बुराईया अपने देश में है..पर सब लोग तो अच्छे नहीं ही होंगे...
अपने देश के बारे में बुराईया करने से पहेले एक बार नहीं सौ बार सोचो.
फिर ही हमें हक्क है कुछ बोलनेका .

--

Thursday, January 22, 2009

यादो की गली

आज अचानक अपनी यादो की गली से गुजरना हुवा था..
पर देखा तो शहर की तरह उसके रस्ते भी बहोत बदल गये थे...
अपनी यादो का तो कोई ठिकाना ही नहीं था..
और न तुम्हारा..
बस मै तो वहा अकेली थी जिसे मै पहेचानती थी..
फिर मैंने सोचा की वापस खो जाऊ ये गलियों में.
इससे अच्छा है की रास्ता ही बदल लू...
और मैंने रास्ता बदल लिया ..
एक टीस जरुर है,
पर,
उतनी नहीं जीतनी तुम पास होते और मेरे न होते ये देखने से होती...

नीता कोटेचा

Saturday, January 17, 2009

भरम

भरम जितना जल्दी टूट गया अच्छा हुवा,
नहीं तो मरते मरते भी
जान तुम में अटक जाती हमारी...
नीता कोटेचा

रुसवा

यु ही रुसवा होते चले गये दुनिया की नज़रो ,
में हम और तुम्हें ही पता न चला,
तुमसे महोब्बत थी जिसने हमें रुसवा किया॥
नीता कोटेचा

जनाज़ा

यु ही मुस्कराते हुवे जब जनाज़ा उठाया तुमने मेरा..
तो मूह फेर के थोडा एक नज़र भर देखा लिया तुम्हें...
तुम आज भी उतने ही खुबसूरत लग रहे थे.
जब मुझे प्यार करते वक्त मुस्कराते थे..

नीता कोटेचा

Monday, January 12, 2009

एक दोस्त ने msg भेजा..

जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने होते हैं..

कुछ अपने कुछ बेगाने होते हैं.
प्यार से सवर जाती है जिंदगी..

बस प्यार से रिश्ते निभाने होते है..

...
मैंने जवाब दिया.

ज़िन्दगी अगर खुली किताब हो तो मजा आता है..
सब सिर्फ अपने, ना कोई पराया हो..तो मजा आता है...
प्यार से नहीं दिल से निभानी होती है जिन्दगी
और
प्यार से नहीं, भरोसे से ही नभ जाते है रिश्ते
नीता





Friday, January 9, 2009

तुम्हें इतना तो याद है

हमने सोचा की तुम भूल गये हो मुझे..
पर बहोत सालो बाद मुलाकात हुई तो तुमने पूछा ..
"हमारी दोस्ती कैसे टूटी थी ज़रा मुझे यादा दिलाना..
हम भूल गये है वो कारण.."
मैंने कहा अरे छोडो वो कारण ..तुम्हें इतना तो याद है की हम भी कभी दोस्त थे..
वो ही काफी है बाकी जिन्दगी जीने के लिए॥

नीता कोटेचा

Wednesday, January 7, 2009

दोस्त सब गम भुला देते है,

जो तकदीर ने अपने हाथो से लिखे है..

और
जिन्दगी हमें चाहे महोब्बत न करे..
हमने तो मौत को भी दिल देके रखा है..

नीता कोटेचा

Monday, January 5, 2009

सबको गले लगा करा हम जिए है।
सबको अपना बनाके हम जिए है ।
पता नहीं तकदीर क्यों मूह मोड लेती है।
अचानक की
सब अपने होते है फिर भी हम अकेले जिए है॥

नीता कोटेचा
डर लगता है कही कोई दोस्त दूर ना हो जाए वापस.
और भरी दुनिया में हम अकेले न हो जाए वापस.
.ये दुनिया बड़ी है जालिम ए दोस्त ..
इसीलिए सोचती हु की,
जो नजदीक है वो भी दूर न हो जाए वापस --

नीता कोटेचा

Thursday, August 28, 2008

खोखले

...............

दुनिया बदल जाती है, दोस्त बदल जाते है

जब ख़ुद की किस्मत बिगड़ी हो, तो सब लोग बदल जाते है॥

अरे डरो मत दोस्तों,सब बदल गया तो क्या हुवा ॥

पता तो चला की रिश्ते कितने खोखले होते है।

नीता कोटेचा

चल देते है
.............................

कौन अपना ,कौन पराया, पता चल जता है,

जब हम होते है परेशांन

क्योकि तब ही वो लोग मुह मोडके चल देते है

नीता कोटेचा

Tuesday, August 12, 2008

किसीको प्यार करके भूलाना हमें नही आता,
किसीसे दोस्ती करके तोड़ना हमें नही आता,
या करीब मत आना या दूर मत जाना
क्योकि
दोस्त का दूर जाना ये
बर्दास्त करना ये दिल को नही आता ।

नीता कोटेचा
१२-०८-2008

Wednesday, May 28, 2008

बदनाम
......................

इस
तरह से दुनिया ने सताया है मुजे
की
अपना बनाके बहोत रुलाया है मुजे
क्या करे किस्मत ही ऐसी पाई है की
बेगानो ने नही पर
अपनों ने ही बदनाम किया है मुजे

नीता कोटेचा

Tuesday, May 27, 2008

जिदगी का पता नही
........................
कोई अपना बनता है दिलो जा से ज्यादा कभी ,
कोई अपना, बेगाना बनता है दुश्मनों से भी ज्यादा कभी,
क्या करे ये जिदगी का पता नही चलता
कोई अपना आसु देता है
और
बेगाने प्यार करते है अपनो से भी ज्यादा कभी .
नीता कोटेचा

Wednesday, May 21, 2008

अनजाना दोस्त
....................

एक अनजाना दोस्त अपना लगाने लगा ,,

जैसे जीने का एक बहाना लगने लगा,
करीब आए हो तो दूर मत होना अब,
अब तो जैसे दिल का एक कोना तुम्हारा होने लगा.

नीता कोटेचा